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चौपाल: चीन की राह व हिंदी का भविष्य

जब पुतिन ने संविधान में बदलाव के प्रस्ताव रखे तो शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे हैरानी न हो।

Author नई दिल्ली | Published on: January 22, 2020 1:30 AM
अब व्लादीमिर पुतिन ने भी संविधान में बदलाव कर सबको हैरान कर दिया है।

क्या रूस का मतलब अब पुतिन और पुतिन का मतलब रूस हो गया है? क्या पुतिन रूस पर ताउम्र अपनी पकड़ बनाए रखना चाहते हैं? ये सारे सवाल उस वक्त जेहन में उठने लगे जब रूस के प्रधानमंत्री दिमित्री मेदवेदेव और उनके समूचे मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह पुतिन ने मिखाइल मिशुस्टीन को प्रधानमंत्री बनाया। इससे रूस चीन की राह पर चलता दिख रहा है क्योंकि अभी कुछ महीने पहले ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने संविधान में बदलाव किया और चीन पर जिंदगी भर राज करने का अधिकार हासिल कर लिया। अब व्लादीमिर पुतिन ने भी संविधान में बदलाव कर सबको हैरान कर दिया है।

जब पुतिन ने संविधान में बदलाव के प्रस्ताव रखे तो शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे हैरानी न हो। इन प्रस्तावों में राष्ट्रपति की शक्तियां संसद को दिए जाने, राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो कार्यकाल की सीमा तय किए जाने, महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों के लिए निचले सदन को शक्तियां देने और स्टेट काउंसिल का दर्जा बढ़ाने की बात थी। पुतिन का कार्यकाल 2024 को पूरा हो रहा है जिसके बाद उन्हें राष्ट्रपति का पद छोड़ना होगा।

हालांकि उन्होंने सुधार पर जनमत संग्रह करने को कहा है। अब तक यह तो साफ नहीं है कि राष्ट्रपति की योजना कैसे अमल में आएगी, लेकिन जो साफ है वो यह कि पुतिन जानते हैं कि बतौर राष्ट्रपति उनका कार्यकाल आने वाले सालों में खत्म हो जाएगा और वे यह तय करने के लिए काम कर रहे हैं कि उनका प्रभाव और ताकत कई सालों तक बनी रहे। रूस के निचले सदन (ड्यूमा) की शक्तियां बढ़ाने को लेकर ये कयास लगाए जा रहे हैं कि शायद 2024 के बाद पुतिन प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं।

’मो. ताबिश, जामिया मिल्लिया इस्लामिया

हिंदी का भविष्य

अपनी भाषा की प्रगति के लिए उससे ‘मनसा वाचा कर्मणा’ यानी मन, वाणी और कर्म से लगाव होना बेहद जरूरी है। अपनी भाषा हिंदी को लेकर मेरा अनुभव है कि वाणी के स्तर पर बहुत से लोग इसे विश्व की प्रमुख भाषा बनाना चाहते हैं। ऐसे लोगों में वे भी शामिल हैं जो मन के स्तर पर हिंदी के भविष्य को लेकर ऊहापोह की स्थिति में फंसे रहते हैं। फलस्वरूप, वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाते हैं। कर्म के स्तर पर हिंदी के उन्नयन के लिए ठोस कार्य करने वालों की संख्या तो और भी कम है।
आप देश की किसी भी प्रयोगशाला या उच्च शिक्षण संस्थान में जाएं तो देखेंगे कि वहां अधिकांश शोध कार्य अंग्रेजी में होता है। पूरे देश में ऐसे लोगों की संख्या सिर्फ हजारों में होगी जिनकी बैंक की पासबुक में उनका नाम हिंदी में लिखा होगा। एक सौ संैतीस करोड़ की आबादी वाले देश में मुझे नहीं लगता है कि किसी के पास ऐसा पासपोर्ट होगा जिसमें सब कुछ हिंदी में लिखा हो। ऐसी परिस्थितियों के चलते समझ नहीं आता है कि हम हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बना कर क्या हासिल करना चाहते हैं?

’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

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