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चौपाल: आरक्षण के बहाने

हमारे संविधान निर्माताओं ने शैक्षिक-सामाजिक पिछड़ों के उत्थान के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी पर वे आरक्षण के लिए गरीबी व न्यूनतम योग्यता का मापदंड क्यों भूल गए? पिछले सत्तर वर्षों से बार-बार लाभ लेकर क्रीमीलेयर के तहत आए लोग भला आरक्षण के हकदार क्यों होने चाहिए?

Author Published on: March 14, 2019 4:00 AM
साल 2016 में आरक्षण के लिए प्रदर्शन करते जाट समुदाय के लोग। (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

सवर्ण गरीबों के लिए आरक्षण के विरोधी तर्क देते हैं कि यह गरीबी हटाने का कार्यक्रम नहीं है और जब तक नए रोजगारों का सृजन नहीं किया जाता, सब व्यर्थ है। यहां हमें याद रखना चाहिए कि गरीबी स्वरोजगार, कर्मठता, ईमानदार कड़े परिश्रम आदि से हटती है कर्जमाफी, मुफ्तखोरी, मुआवजों, अनुदानों, तमाम तरह की सरकारी सुविधाओं आदि से नहीं। ये तमाम सरकारी कृपाएं लोगों को परमुखापेक्षी, अकर्मण्य और आलसी भी बनाती हैं। ऐसे देश ही शक्तिशाली संपन्न साम्राज्यवादियों के गुलाम बनते हैं। हम दरअसल गरीबी का महिमामंडन व अमीरों को गालियां देना बंद कर स्वयं सक्षम-समर्थ बनें, तभी अमीर-गरीब की खाई कम होगी।

हमारे संविधान निर्माताओं ने शैक्षिक-सामाजिक पिछड़ों के उत्थान के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी पर वे आरक्षण के लिए गरीबी व न्यूनतम योग्यता का मापदंड क्यों भूल गए? पिछले सत्तर वर्षों से बार-बार लाभ लेकर क्रीमीलेयर के तहत आए लोग भला आरक्षण के हकदार क्यों होने चाहिए? वैसे सवर्ण गरीब से एलर्जी शोध का विषय है। इसका समाधान है कि समस्त अनारक्षित स्थान शेष बची सामान्य सवर्ण जातियों के लिए आरक्षित कर दिए जाएं। इनमें गरीबों के लिए प्राथमिकता हो। सामाजिक न्याय व सबके लाभ के लिए जीवन में केवल एक बार आरक्षण का लाभ मिलना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि रोजगार का अर्थ केवल सरकारी नौकरी नहीं होता। आप सबको सरकारी नौकरी दे भी नहीं सकते। केवल अवसर पैदा कीजिए जो निजी उद्योग, व्यापार, सेवा आदि क्षेत्रों में हों तो लोग अपनी पसंद व क्षमता के मुताबिक रोजगार चुन लेंगे। सरकारी नौकरी का आकर्षण इसलिए है कि वहां काम अपेक्षया कम और आकर्षक वेतन व भविष्य की सुरक्षा गारंटी अधिक होती है। सरकारी नौकरी के लिए तो सारे बारोजगार भी बेरोजगार हैं और हाथ आए अवसर का लाभ उठाने से नहीं चूकते, चाहे वे अपने पैतृक उद्योग-व्यापार-दस्तकारी में संलग्न क्यों न हों!
’राधेश्याम ताम्रकर, इंदौर, मध्यप्रदेश

अलग दल
पंचायती राज के अनुभवों से स्पष्ट है कि तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने से महिलाओं को कोई विशेष लाभ नहीं होगा। दरअसल, ऐसे आरक्षण का सर्वाधिक लाभ उन्हीं महिलाओं को मिलेगा जिनके पति पहले से नेता हैं। बहरहाल, वोट की राजनीति का यह एक हिस्सा है कि समाज को जैसे भी संभव हो, बांटते रहें- कभी आर्थिक आधार पर, कभी क्षेत्र के आधार पर, कभी धर्म के आधार पर, कभी जाति के आधार पर और कभी लिंग के आधार पर।
अगर महिलाएं सचमुच अपना स्थायी भला चाहती हैं तो वे अपना अलग राजनीतिक दल बनाएं और संसद में बहुमत स्थापित करें। उनका नारा होना चाहिए- ‘सत्ता सबको प्यारी है और अब हमारी बारी है।’
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

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