ताज़ा खबर
 

चौपाल: आरक्षण की समीक्षा

आरक्षण आज हर पार्टी के लिए बड़ा वोट बैंक बन चुका है। दशकों से चले आ रही आरक्षण व्यवस्था का लाभ कितने फीसद लोगों को मिला है, इसके लिए सरकार को स्पष्ट आंकड़े जुटाने की जरूरत है।

Author Published on: September 16, 2019 5:51 AM
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल

हाल में छत्तीसगढ़ सरकार ने ओबीसी और एससी-एसटी की आरक्षण सीमा को अट्ठावन से बढ़ा कर बयासी फीसद कर दिया है। इसमें आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण वर्ग को भी कुल बचे पद का दस फीसद आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। इस तरह छत्तीसगढ़ सबसे ज्यादा आरक्षण देने वाला राज्य बन गया है। विडंबना यह है कि आजादी के सात दशक बाद आरक्षण की व्यवस्था को जहां धीरे-धीरे समाप्त करने की दिशा में बढ़ा जाना चाहिए था, वहां अब इसका इस्तेमाल सरकारें समाज के विभिन्न वर्गों में आपसी वैमनस्यता पैदा करने में कर रही हैं।

आरक्षण आज हर पार्टी के लिए बड़ा वोट बैंक बन चुका है। दशकों से चले आ रही आरक्षण व्यवस्था का लाभ कितने फीसद लोगों को मिला है, इसके लिए सरकार को स्पष्ट आंकड़े जुटाने की जरूरत है। केंद्र और राज्य स्तर पर आंकड़े जुटा कर उनका अध्ययन किया जाना चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि वाकई अब तक आरक्षण का लाभ कितने फीसद लोगों को मिला है। आमतौर पर देखने को यही मिला है कि आरक्षण का लाभ पीढ़ी दर पीढ़ी लिया जा रहा है। जरूरतमंद एर हकदार लोग इससे वंचित रह जाते हैं।

1947 के भारत और अब के भारत में काफी बदलाव आ चुका है। आरक्षण से जहां एक वर्ग वर्षों से लाभान्वित हो ता आ रहा है, तो दूसरी तरफ सामान्य वर्ग को इसका खमियाजा भुगतना पड़ रहा है। इसमे कोई दो मत नही है कि इतने वर्षों में सामान्य वर्ग को आरक्षण की वजह से कोई नुकसान नहीं हुआ है। आरक्षण बढ़ने से सरकारी नौकरियों में अनारक्षित वर्गों के पदों में कमी आएगी। आरक्षण की व्यवस्था जहां एक वर्ग के लिए हितकर है, वहीं दूसरे वर्गों की यह उपेक्षा करती है। सरकार को चाहिए कि इसकी जमीनी स्तर पर जानकारी हासिल करके ही इसकी समीक्षा कर इसे बढ़ाने का निर्णय ले।
’अमित पांडेय, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

जवाबदेही जरूरी
नए मोटर वाहन कानून में यातायात नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माने और दंड का प्रावधान किया गया है। इसको लेकर विवाद जारी है और लोगों में रोष भी है। कुछ राज्य सरकारें भी खुल कर इसके विरोध में आ गई हैं। यह तो सभी जानते हैं कि बिना हेलमेट पहने, बिना सीट बेल्ट लगाए, मोबाइल पर बात करते गाड़ी चलाना जैसी आदतें गंभीर मुसीबत का कारण बन सकती हैं। मगर लोगों में सतर्क न रहने की आदत बन गई है, तो इसकी कुछ वजह यातायात पुलिस की लापरवाही भी है। अक्सर वह कानून का उल्लंघन करने वालों को किसी दबाव में आकर या कुछ रिश्वत लेकर छोड़ देती है। इस तरह लोगों में धारणा बन गई है कि अगर वे कोई गलती करेंगे तो आसानी से बच निकलेंगे। इसलिए केवल जुर्माने के भय से लोगों में कानून तोड़ने की प्रवृत्ति को खत्म करने का दावा नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित महकमों को भी जवाबदेह बनाना जरूरी है।
’अजीत कुमार गौतम, गोरखपुर

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 चौपाल: हिंदी और हिंदुस्तान
2 चौपाल: भाषाई गुलामी, विकल्प की दरकार व हिंदी के साथ
3 चौपाल: जलते जंगल व मुआवजा भी