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चौपाल: असली मुद्दे गायब, स्वागतयोग्य कदम व इनका भी रखना है ध्यान

साल 2021 से देश के अट्ठाईस सैनिक स्कूलों में अब लड़कियां भी दाखिला ले सकेंगी। उन्हें बीस फीसद तक आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है।

Author Published on: October 21, 2019 2:15 AM
पहला सैनिक स्कूल आज से अट्ठावन साल पहले सतारा (महाराष्ट्र) में खोला गया था।

हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में इस बार सत्तारूढ़ दल ने जिस तरह से राष्ट्रीय मुद्दों को उठाया है, उसमें चरम राष्ट्रवाद के प्रदर्शन की झलक मिलती है। इन दोनों राज्यों के गांव, गरीब, किसानों की समस्याओं और बेरोजगारी का कश्मीर और अनुच्छेद 370 से कोई सीधा सरोकार नहीं है। इसके बावजूद इन मुद्दों को उठाना आमजन की समस्याओं से मुंह मोड़ने जैसा है। ऐसे में चुन कर आने वाले जनप्रतिनिधि क्षेत्रीय और स्थानीय समस्याओं को लेकर कितने संवेदनशील और उत्तरदायी होंगे, इसमें सन्देह है।

चुनाव बाद जनता भी अपनी समस्याओं को जनप्रतिनिधियों के समक्ष उठाने से इसलिए कतराएगी कि उसकी समस्याएं कभी चुनावी मुद्दा ही नहीं बन पाईं।  इससे मूल लोकतांत्रिक उद्देश्यों की प्राप्ति दुष्कर हो जाएगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि अनुच्छेद 370 हटाया जाना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, लेकिन विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा गरीब, भुखमरी की शिकार, बेरोजगारी से बेहाल जनता के लिए अप्रासंगिक है।

महेंद्र नाथ चौरसिया, सिद्धार्थनगर

स्वागतयोग्य कदम

साल 2021 से देश के अट्ठाईस सैनिक स्कूलों में अब लड़कियां भी दाखिला ले सकेंगी। उन्हें बीस फीसद तक आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। रक्षा मंत्रालय की इस घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए। अभी उन्नीस और सैनिक स्कूल खोलने पर काम चल रहा है। पहला सैनिक स्कूल आज से अट्ठावन साल पहले सतारा (महाराष्ट्र) में खोला गया था।

तबसे से लेकर आज तक इसमें लड़कों को ही प्रवेश दिया जाता है। पर अब इसमें लड़कियां भी शिक्षा हासिल कर सकेंगी। आज बेटियां फौज से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी कामयाबी का परचम लहरा रही हैं तो फिर सैनिक स्कूलों से उन्हें दूर रखने का कोई औचित्य नहीं बनता। प्रायोगिक परियोजना के तहत मिजोरम में पिछले वर्ष ही लड़कियों को छठी कक्षा में दाखिला दिया जा चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि पढ़ाई के मामले में यहां भी बेटियां अव्वल रहेंगी।

’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर

इनका भी रखना है ध्यान

आजकल ऑनलाइन खरीद का चलन बढ़ता जा रहा है। अब तो त्योहारों पर ज्यादातर खरीदारी ऑनलाइन होने लगी है। जूते, कपड़े, ज्वेलरी, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट और सजावट का सामान लोग ऑनलाइन ठिकानों से ही करते हैं। कई ऑनलाइन कंपनियां तो मिट्टी के कलात्मक पात्र, दीये तक बेच रही हैं। इससे देश के छोटे-छोटे कारीगरों की रोजी-रोटी पर बुरा असर पड़ा है।

एक छोटा-सा दीपक बनाने में कुम्हार को काफी अथक परिश्रम करना पड़ता है, तब जाकर वह बाजार में बिकने आता है। अच्छा हो, हम सब इन छोटे स्थानीय कलाकारों, कुंभकारों का भी ध्यान रखते हुए मिट्टी के दीये ,मूर्तियां और अन्य सामान इनसे खरीदें, ताकि उनकी कला की भी कद्र हो और वे भी आनंद और उल्लास के साथ दीपावली का त्योहार मना सकें।

’संजय डागा, हातोद

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