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चौपाल: मुनाफे की शिक्षा

एक रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2016 तक भारत के 20 राज्यों के सरकारी स्कूलों में होने वाले दाखिलों में 1.3 करोड़ की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी तरफ निजी स्कूलों में इसी दौरान 1.75 करोड़ नए छात्रों ने दाखिला लिया।

Author March 16, 2019 4:00 AM
सरकारी स्कूलों में होने वाले दाखिलों में 1.3 करोड़ की गिरावट दर्ज की गई।

यह बहुत अफसोसनाक है कि हमारे देश में सरकारी स्कूलों को व्यवस्थित तरीके से खत्म करने का काम सरकारें ही कर रही हैं। आज भारत के किसी भी राज्य में सरकारी स्कूलों की हालत अच्छी नहीं है। वैसे तो इन स्कूलों को खत्म करने की योजना 1990 से पहले ही शुरू हो गई थी लेकिन 1990 के दशक की नव उदारवादी नीतियांं लागू होने के बाद देश में पूंजीपति वर्ग की नुमाइंदगी करने वाली किसी भी सरकार के लिए इस मुहिम को आगे बढ़ाना और भी ज्यादा आसान हो गया। तब पूंजी के लिए बाजार खोल दिया गया और शिक्षा को भी एक बाजारू माल बनाने की पहल कदमी शुरू हो गई। सरकारी स्कूलों को नियोजित तरीके से खत्म करने के साथ-साथ प्राइवेट स्कूलों को बढ़ावा दिया जाने लगा। इससे स्कूल शिक्षा केंद्र न रह कर ‘बिजनेस’ बनते चले गए। पूंजीपति वर्ग ने अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में भी पूंजी लगानी शुरू कर दी जिससे जल्दी ही पूरे देश में निजी स्कूलों की बाढ़-सी आ गई।

एक रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2016 तक भारत के 20 राज्यों के सरकारी स्कूलों में होने वाले दाखिलों में 1.3 करोड़ की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी तरफ निजी स्कूलों में इसी दौरान 1.75 करोड़ नए छात्रों ने दाखिला लिया। यह आंकड़ा इस बात की पुष्टि करता है कि सरकारी स्कूलों के ढांचे में सुधार न करने की कोशिश के चलते उनकी लोकप्रियता में लगातार गिरावट आ रही है। नतीजतन, आज एक मजदूर भी अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में भेजने पर मजबूर है। सरकारी स्कूलों के ढांचे को इस बात से भी जांचा परखा जा सकता है कि 2016 की संसद की और 11 जनवरी, 2019 की जनसत्ता की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब एक लाख से ज्यादा सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक अध्यापक स्कूल चला रहा है। इसमें पहले नंबर पर मध्यप्रदेश है जहां ऐसे स्कूलों की संख्या 17,874 है और उत्तर प्रदेश 17,602 संख्या के साथ दूसरे नंबर पर है। आज भारत में सरकारी स्कूलों के मुकाबले निजी स्कूलों की संख्या 450 गुना तेजी से बढ़ रही है। शिक्षा को धंधा बनाने का यह सिलसिला आखिर कहां जाकर थमेगा?
’प्रवीन, कुरूक्षेत्र, हरियाणा

जमीनी हकीकत
स्वच्छ भारत अभियान के ताजा आंकड़ों के अनुसार स्वच्छता का दायरा करीब 90 फीसद तक पहुंच चुका है। लेकिन जमीनी हकीकत तो इस आंकड़े से एकदम जुदा है। सिर्फ शौचालय बनवाने और कुछ विज्ञापन जारी कर देने मात्र से इस बड़ी समस्या को खत्म करना मुश्किल है। हालत यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तमाम शौचालय अब स्टोर रूम बनने लगे हैं और लोग खुले में शौच के अपने पुराने ढर्रे पर आना शुरू हो गए हैं। इसके मद्देनजर विभिन्न जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए पूर्वस्थिति कायम होने से रोकना होगा। स्वच्छता अभियान की सफलता के लिए आमजन की भागीदारी अब अपरिहार्य हो चली है।
’सुमित यादव, कालपी, उत्तर प्रदेश

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