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चौपाल: सत्ता और समाज

तमाम तरह के अपराधों में सजा का क्या प्रावधान हो इस बारे में जनता का अधिकांश हिस्सा जिस आक्रोशित बिंदु पर जाकर रुकता है, सरकारें उसकी हिमायती बनने लगती हैं। यह करना उनके लिए आसान होता है।

Author June 14, 2019 1:22 AM
तमिलनाडु के मदुरै में वोटिंग बूथ के बाहर कतार में खड़े मतदाता। (फोटोः पीटीआई)

राजनीति और समाज का अंतर्संबंध तेजी से बदला है। जब कभी सामाजिक आंदोलनों के विस्तार का दौर आया है, तब राजनीति अपनी विलास-सामग्री से नजर हटा कर उन आंदोलनों में शरीक हुई है। राजनीति ने सामाजिक आंदोलनों से उठने वाले सैलाब को नतमस्तक, या कहें मजबूर होकर स्वीकार किया है। यह वह दौर था जब हमारा लोकतंत्र अपनी जड़ें विकसित कर रहा था। देश के विकासवान लोकतांत्रिक मूल्यों ने राजनीति के भीतर जनहित को स्थापित किया। राजनीति और सत्ताएं तब जनता से भय खाती थीं। इस भय के मूल विश्लेषण की तह में देखने पर एक बात तो साफ हो जाती है कि तब जनता नए-नए लोकतंत्र से मिलने वाले सम्मान और अधिकारों से खुश थी और उसे राजनीति से कुछ अपेक्षाएं व उम्मीदें थीं। जनाकांक्षाएं सत्ता और राजनीति के गलियारों में विलासितापूर्ण रवैयों को कोई अवसर नहीं दे रही थीं। मठाधीशों को यह सब रास नहीं आ रहा था लेकिन देश के तमाम ताकतों के बीच खेलने के आदी नेता सत्ता से बाहर भी नहीं रहना चाहते थे।

वर्तमान राजनीति ने अपना स्वरूप बदला है। टेक्नोलॉजी और सूचना तंत्र का जितना इस्तेमाल देश के नागरिकों को अपनी जागरूकता बनाए रखने के लिए करना जरूरी था, उससे कहीं अधिक इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियों ने अपना एजेंडा जमाने में किया। चुनावों में अब पार्टियों को जनता के भीतर भरे उस गुबार को जान पाना कठिन नहीं रह गया, जिसके चलते कई बार मजबूत सरकारों की नींवें तक भरभराकर गिर पड़ीं। अब सूचना-तंत्र के कई मंच विकसित हुए हैं जिनसे हर नागरिक समान रूप से जुड़ा हुआ है। सोशल मीडिया आदि पर जनभावनाओं का अंबार लगा हुआ है। सरकार की अच्छी नीतियों से लेकर गलत निर्णयों तक पर जनता की प्रतिक्रियाएं आसानी से मिल जाती हैं। मीडिया के इस्तेमाल से लैस पार्टियां व सरकारें इन प्रतिक्रियाओं को अपनी अदृश्य उपस्थिति के साथ आकलित करती रहती हैं। इस तरह इन मंचों पर व्यक्त जनाकांक्षाएं व जनाक्रोश से सत्ताएं ‘फीडबैक’ लेने का कार्य करती हैं और यहीं से राजनीति जनता की भावनाओं का इस्तेमाल करना शुरू कर देती है। जाति, धर्म आदि गुटबंदियों को लेकर जनभावना क्या है, इसका सर्वे करने का काम पार्टी मुख्यालयों से होना शुरू होता है। तमाम तरह के अपराधों में सजा का क्या प्रावधान हो इस बारे में जनता का अधिकांश हिस्सा जिस आक्रोशित बिंदु पर जाकर रुकता है, सरकारें उसकी हिमायती बनने लगती हैं। यह करना उनके लिए आसान होता है।

जनभावनाओं पर इस तरह न्योछावर सरकारों की तारीफें जरूर हो सकती हैं पर यह देखना भी बहुत जरूरी है कि क्या ये सत्ताएं सभी मुद्दों पर यही तरीका अपनाती हैं या फिर चुनिंदा मुद्दों पर। जब इस बिंदु पर गहराई से विचार किया जाता है तो यही निष्कर्ष निकलता है कि सरकारें यहां पर चुनिंदा नजरिये से ही कार्य करती हैं। इससे फायदा यह हुआ है कि अब सामाजिक आंदोलनों का दबाव सरकारों पर कम पड़ता है। अब सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग सामाजिक आंदोलनों के वक्त उन्मादी व अराजक मुद्दों पर जनभावनाओं को भड़काने लगते हैं। अब जब भी कोई मुद्दा जनभागीदारी से उठता है तो उसमें पार्टीगत विचारधारा के कार्यकताओं को उस अभियान में प्रतिनिधित्व के लिए भेज दिया जाता है। इससे जनता की मूल मांगें रास्ते से भटक जाती हैं और सरकारों का काम आसान हो जाता है।
’आशीष कुमार तिवारी, अलीगढ़ विवि

 

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