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चौपाल: सियासी हिंसा

एक दौरे के समय मुख्यमंत्री भी भाजपा कार्यकर्ताओं के नारे सुन कर भड़क उठी थीं। लिहाजा, राज्य में हिंसा रोकने के लिए केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करने की जरूरत है जिससे लोग खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।

Author June 6, 2019 1:27 AM
पीएम नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। आए दिन तृणमूल कांग्रेस और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच झड़प की खबरें आती रहती हैं। कई बार झड़प के दौरान किसी कार्यकर्ता की मौत भी हो जाती है। राजनीति हिंसा दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। प्रदेश सरकार पर अरोप लग रहे हैं कि तृणमूल कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे में सरकार की भूमिका संदिग्ध हो जाती है। एक दौरे के समय मुख्यमंत्री भी भाजपा कार्यकर्ताओं के नारे सुन कर भड़क उठी थीं। लिहाजा, राज्य में हिंसा रोकने के लिए केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करने की जरूरत है जिससे लोग खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।

’रितेश कुमार उपाध्याय, संत कबीर नगर

सुलगते जंगल

इन दिनों उत्तराखंड के वनाच्छादित पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर, टिहरी, उत्तरकाशी व रुद्रप्रयाग-देहरादून जिलों में जंगल की आग लोगों को डराने का काम कर रही है। इनमें से कुछ जंगलों की आग पर काबू पा लिया गया है, लेकिन अभी भी कई जगहों के जंगल धधक रहे हैं। पौड़ी जिले के विकासखंड कीर्ति नगर में राजकीय इंटर कॉलेज जंगल की आग के चपेट में आकर स्वाहा हो गया। इस भीषण गर्मी में जंगलों में आग लगने से न सिर्फ वनस्पतियां नष्ट होती हैं, बल्कि वन्य जीवों के अस्तित्व पर खतरा रहता है। अफसोस की बात है कि जंगलों की यह अब उत्तराखंड के लिए एक सालाना त्रासदी जैसी बन गई है लेकिन उसे रोकने के लिए स्थायी और कारगर उपाय नहीं किए जा रहे हैं। \

सरकारी आंकड़े के मुताबिक अब तक कुल मिला कर जंगल में आग लगने की सोलह सौ से अधिक घटनाएं हुई हैं। बहरहाल, विज्ञान कितनी भी तरक्की कर ले, लेकिन प्रकृति के आगे हमेशा बौना नजर आता है। उत्तराखंड में हर वर्ष फरवरी के बाद से जंगलों में आग लगने की घटनाएं शुरू हो जाती हैं। प्रशासन आग बुझाने का काम भी करता है लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहता है। जून आते-आते हजारों हेक्टेयर जंगल स्वाहा हो जाते हैं। इस दौरान भीषण गर्मी में आग बुझाना प्रशासन के बस में नहीं रहता। लिहाजा, प्रशासन खानापूर्ति कर जुलाई में बरसात के साथ हो लेता है। सवाल है कि जंगलों में लगी आग को बुझाने के लिए तकनीकी तरक्की, पर्यावरणीय राज्य, जैविक संतुलन और पर्यटन की अपार संभावना सहेजे राज्य के प्रति इस तरह की लापरवाही क्यों? पहले से ही हम साफ पानी, स्वच्छ हवा और सदाबहार मौसम के लिए कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। कई पर्यावरणीय सवाल भी हवाओं में तैर रहे हैं, जिन्हें जवाब का इंतजार है।
’पवन कुमार मौर्य, नई दिल्ली

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