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संयम के साथ

एक जिम्मेदार नागरिक के नाते हमारी हर प्रतिक्रिया संयमित होनी चाहिए। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे आदर्श, मूल्य और परंपराएं इस तरह की भड़काऊ बातों की अनुमति नहीं देते। अगर हम भी वही सब करने लगे जो पाकिस्तान कर रहा है तो हममें और उसमें अंतर क्या रह जाएगा?

Author February 26, 2019 4:24 AM
पुलवामा हमले के बाद पीएम मोदी ने कहा था कि शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। उन्होंने इसी के साथ कश्मीर में सुरक्षाबलों को कड़ी कार्रवाई करने के लिए खुली छूट दे दी थी। (फोटोः एजेंसियां)

पुलवामा के आतंकी हमले में 44 जवानों की शहादत के बाद हर किसी की जुबान पर एक ही बात है कि पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया जाए। आम आदमी की भाषा में मुंहतोड़ जवाब देने का मतलब युद्ध करना या बम गिराना है जो आज के लोकतांत्रिक परिवेश में संभव नहीं है। ईंट का जवाब पत्थर से देने का अर्थ यह भी नहीं है कि हम अपने आदर्श, राजनीतिक संयम और मर्यादाएं भूल जाएं। सेना के जवानों की शहादत, घाटी के हालात और पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की घिनौनी करतूतों को देख देश के लोगों का गुस्सा जायज है। ऐसे में आम आदमी का खून खौलना भी स्वाभाविक है। लेकिन एक जिम्मेदार देश के जिम्मेदार नागरिक के नाते हमारा फर्ज बनता है कि जोश में होश न गंवाएं। सरकार और सोशल मीडिया पर ऐसी कोई सलाह न दें जो अतिशयोक्तिपूर्ण हो। जैसे, पाकिस्तान को बम से उड़ा दो, उसे नेस्तनाबूद कर दो या घाटी के पत्थरबाजों को गोली मार दो! यह सच है कि पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई दिखनी चाहिए। लेकिन कार्रवाई का मतलब युद्ध ही नहीं होता है।

विपदा की घड़ी में राष्ट्र के हर नागरिक से संयम की उम्मीद की जाती है। कश्मीरी युवाओं के साथ मारपीट करना भी इसी असंयमशीलता का परिचायक है। बेशक जिस आतंकवादी मुल्क ने दहशतगर्दों को पनाह दी है, हमारे जांबाज सैनिकों की जान ली है उसे निशाना बनाया जाए लेकिन उसके लिए समूची कौम और समूचे कश्मीर को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं कहा जा सकता। एक जिम्मेदार नागरिक के नाते हमारी हर प्रतिक्रिया संयमित होनी चाहिए। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हमारे आदर्श, मूल्य और परंपराएं इस तरह की भड़काऊ बातों की अनुमति नहीं देते। अगर हम भी वही सब करने लगे जो पाकिस्तान कर रहा है तो हममें और उसमें अंतर क्या रह जाएगा?

राजनीतिक दलों को चूंकि एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ना होता है इसलिए सेना के मनोबल के नाम पर कुछ दिन साथ दिखने का दिखावा करने के बाद अब वे भले ही एक-दूसरे की आलोचना कर अपनी चुनावी पटरी पर लौट आए हों लेकिन एक नागरिक के नाते हमारी ऐसी कोई मजबूरी नहीं है कि किसी तरह की भड़काऊ बातें कर देश का वातावरण दूषित करें। आज के वैश्विक और प्रजातांत्रिक परिवेश में कूटनीतिक और आर्थिक युक्तियों से ही पाकिस्तान जैसे देशों को सबक सिखा कर अलग-थलग किया जा सकता है। सेना का मनोबल गिराने वाली और भड़काऊ बातें करने से हर किसी को बचना चाहिए। जल्दी ही आम चुनाव है। नेताओं को भी चुनाव के दौरान ऐसे किसी वादे से जनता को गुमराह नहीं करना चाहिए जिसे पूरा करना संभव न हो या जो बाद में किसी जुमले में तब्दील हो जाए!
’देवेंद्र जोशी, महेश नगर, उज्जैन

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