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चौपाल: नए नियम

सड़कों पर बैठे पशुओं का भी कुछ उपाय करना चाहिए, हजारों लोग इनके कारण दुर्घटना का शिकार होते हैं। इन दुर्घटनाओं में मूक पशु भी तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते हैं। उन्हें कोई उठाने वाला भी कोई नहीं होता, जो अमानवीय है।

Author Published on: September 5, 2019 3:50 AM
1 सितंबर से ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर भारी भरकम जुर्माना लग रहा है।

यातायात के नए नियमों के तहत चालान की राशि व कानूनी सजा बढ़ाया जाना केंद्र सरकार का स्वागतयोग्य कदम है। इससे निश्चित ही सड़क दुर्घटनाओं, शराब पीकर या तेज गति से वाहन चलाने आदि पर लगाम लगेगी। देश के लाखों युवा असमय ही सड़क दुर्घटनाओं का शिकार होकर अपने परिवारों को अधर में छोड़ जाते हैं। इस पीड़ा को वही समझ सकता है जिसने अपने घर के चिराग को सड़क दुर्घटना में खोया होगा। बहरहाल, इन नियमों के साथ यह प्रावधान भी होना चाहिए था कि सड़क के किसी गड्ढे में गिरने से हुई दुर्घटना में जिम्मेदारी सड़क निर्माता कंपनी की होगी। अंधे मोड़ पर हुई दुर्घटनाओं में सुरक्षा इंतजामों में कमी के लिए भी सड़क बनाने वाली कंपनी को दोषी माना जाना चाहिए। बिना पूरी सड़क बनाए टोल राशि नहीं ली जाएगी, टोल लेने पर अनुमति क्षेत्र में सफेद पट्टी, संकेतक, गति अवरोधक आदि का आवश्यकता अनुसार उपयोग हो ताकि रात में वाहन चलाने वालों को परेशानी न हो।

सड़कों पर बैठे पशुओं का भी कुछ उपाय करना चाहिए, हजारों लोग इनके कारण दुर्घटना का शिकार होते हैं। इन दुर्घटनाओं में मूक पशु भी तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते हैं। उन्हें कोई उठाने वाला भी कोई नहीं होता, जो अमानवीय है। नगरों व शहरों में गाड़ियों की जांच सतत चलनी चाहिए, जिससे बिना परमिट के वाहनों व चोरी के वाहनों की धरपकड़ संभव होगी। बिना नंबर प्लेट और चोरी के वाहनों से लोग आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते हैं लिहाजा इनके खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए। चालान राशि बढ़ने से रिश्वतखोरी भी बढ़ेगी, जिसका फायदा सीधे-सीधे भ्रष्ट यातायात पुुलिसकर्मियों को होना है। इन पर रोक कौन लगाएगा? जनता की सुरक्षा व सुविधा के लिए बनाए गए नियमों को लागू किया जाना चाहिए, पर उससे पहले इनका उचित प्रचार-प्रसार व उस स्तर की सुविधाएं भी वाहन चालकों को दी जाएं।
’मंगलेश सोनी, मनावर, धार, मध्यप्रदेश

कैसे बनेंगे विश्वगुरु
हमारे कुछ नेता और विचारक हमें जब-तब विश्वगुरु बनने का सपना दिखाते रहते हैं। विश्वगुरु बनने के लिए जरूरी है कि हम विभिन्न क्षेत्रों में आशातीत प्रगति करें। मेरे विचार से क्यों न हम ओलंपिक खेलों में अपनी उपलब्धियों पर चर्चा करें? आजादी के बाद 1948 के लंदन ओलंपिक में हमें एक स्वर्ण पदक मिला और फिर 1952 में हेलसिंकी ओलंपिक में एक स्वर्ण और एक कांस्य पदक मिला। 1984, 1988 और 1992 के ओलंपिक खेलों में हमारा खाता ही नहीं खुला।

बहरहाल, 2008 के बीजिंग ओलंपिक खेलों में हमें एक स्वर्ण और दो कांस्य पदक मिले और हम पदक तालिका में दुनिया के देशों में 51वें नंबर पर थे। 2012 के लंदन ओलंपिक में हमें दो रजत और चार कांस्य पदक मिले और हम पदक तालिका में 55 वें स्थान पर रहे तो 2016 के ब्राजील में आयोजित रिओ ओलंपिक में हमें एक रजत और एक कांस्य पदक मिला और हम पदक तालिका में कुल 31 लाख की आबादी वाले देश मंगोलिया के साथ 67वें स्थान पर रहे। क्या इस रफ्तार से हम विश्वगुरु बन सकते हैं?
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली

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