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चौपाल: मील का पत्थर

समाज में शिक्षा की पहुंच हर तबके तक सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिक स्तर से उच्च माध्यमिक स्तर तक निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण बिंदु भी शामिल किया गया है जो निस्संदेह प्रारूप में सर्वोत्तम बिंदु है।

Author July 4, 2019 5:35 AM
हिंदी भाषा को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाने की बात प्रमुख है।

केंद्र सरकार ने हाल ही में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारूप जारी किया और शिक्षाविदों, विद्यार्थियों और अभिभावकों से सुझाव भी आमंत्रित किए। इस प्रारूप को डॉ के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति ने देशभर से आए जन सुझावों को ध्यान में रख कर तैयार किया है। मसौदे में निहित नवीनतम राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उद्देश्य विद्यार्थियों को गुणात्मक शिक्षा प्रदान करने, उनके सर्वांगीण विकास की दिशा में उचित कदम उठाने एवं उन्हें रोजगारपरक ज्ञान उपलब्ध कराने से जुड़ा है। इसके अतिरिक्त शिक्षा के विभिन्न आयामों- अधिगम (लर्निंग), तर्कसंगतता (लॉजिकल) एवं जवाबदेही में सकारात्मक एवं गुणात्मक परिवर्तन की भी बात कही गई है।

समाज में शिक्षा की पहुंच हर तबके तक सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिक स्तर से उच्च माध्यमिक स्तर तक निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण बिंदु भी शामिल किया गया है जो निस्संदेह प्रारूप में सर्वोत्तम बिंदु है। समिति की कुछ सिफारिशें ऐसी भी थीं जिन्हें केंद्र द्वारा अस्वीकार किया गया जिनमें हिंदी भाषा को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाने की बात प्रमुख है। यह निर्णय जाहिर तौर पर दक्षिण भारतीय राज्यों में व्यापक स्तर पर काफी लंबे समय से मौजूद भाषायी स्वायत्तता को ध्यान में रख कर किया गया है जिससे राष्ट्र की अखंडता को कोई खतरा न पहुंचे। इस फैसले पर काफी ज्यादा विरोधाभास पनप सकता है।

खैर, अब सवाल है कि आगे क्या? क्या इन सभी सिफारिशों पर अमल कर इन्हें जल्द लागू करने के प्रयास किए जाएंगे? क्या इन बिंदुओं के लागू होने के स्थिति में इनकी नियमित रूप से निगरानी जाएगी? इन सभी प्रश्नों के उत्तर की दिशा में एक राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के गठन का सुझाव दिया गया है जिसकी अध्यक्षता स्वयं प्रधानमंत्री करेंगे। वह आयोग नियमित रूप से देश में आवश्यक शैक्षणिक सुधारों की समीक्षा करेगा। सवाल बहुत हैं, और जवाब एक। ऐसे में उम्मीद है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2019 भारत के शैक्षिक एवं बौद्धिक विकास में मील का पत्थर साबित होगी जिसकी तलाश हम 1947 से कर रहे हैं।
’केशव शर्मा, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

 

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