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चौपाल: शिक्षा की उपेक्षा

राज्य सरकारें आज भी शिक्षा को लेकर पर्याप्त गंभीर नहीं हैं। शायद इसलिए कि यह उनके वोट बैंक को प्रभावित नहीं करती। दरअसल, समाज के कमजोर तबके के बच्चे ही सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं जबकि संपन्न वर्ग के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं।

Author May 16, 2019 1:48 AM
स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति तक नहीं होती।

देश में सरकारी स्कूल का बंद होना और निजी स्कूलों का तेजी से खुलना शुभ संकेत नहीं है। सरकारी स्कूलों की हालत सुधारे बिना देश का सतत विकास नहीं हो सकता। इनकी अनदेखी कर हम केवल एकतरफा विकास को बढ़ावा देते रहे हैं। अगर अब ध्यान नहीं दिया तो देर हो जाएगी। देश में शिक्षा का अधिकार कानून और सर्वशिक्षा अभियान जैसी योजनाएं लागू होने के बाद भी प्राथमिक शिक्षा की सेहत सुधर नहीं रही है। इसलिए जरूरी है कि सरकार इस बाबत कोई बड़ा कदम उठाए।

राज्य सरकारें आज भी शिक्षा को लेकर पर्याप्त गंभीर नहीं हैं। शायद इसलिए कि यह उनके वोट बैंक को प्रभावित नहीं करती। दरअसल, समाज के कमजोर तबके के बच्चे ही सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं जबकि संपन्न वर्ग के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। सरकारी स्कूलों की उपेक्षा का आलम यह है कि उनमें शिक्षकों की नियुक्ति तक नहीं होती। इसके अलावा उन स्कूलों में ढांचागत सुविधाएं ठीक करने पर ध्यान नहीं दिया जाता। ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूलों में सुधार नहीं हो सकता है। असल बात दृढ़ इच्छाशक्ति की है। दिल्ली सरकार ने हाल में अपने स्कूलों पर अतिरिक्त ध्यान दिया और शानदार नतीजे आए हैं।

हम देश में ‘नालेज पावर’ तो बनाना चाहते हैं लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधार पा रहे हैं। देश में प्राथमिक शिक्षा का हाल यह है कि आज भी पांचवीं कक्षा के करीब आधे बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ तक ठीक से नहीं पढ़ सके। इसलिए जरूरी है कि सरकार बुनियादी ढांचे के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता पर भी ध्यान दे।
’शादाब हुसैन खान, मांझी, छपरा, बिहार

यह नजीर
अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में एक दंपति पर तीन पेड़ काटने पर चार करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। ये पेड़ घर की खूबसूरती बढ़ाने के लिए काटे गए थे। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने पर इतनी सख्त सजा तारीफ के काबिल है। पर्यावरण की रक्षा करनी है तो नुकसान पहुंचाने वाले को कड़े से कड़े जुर्माने व सजा से दंडित किया जाना ही चाहिए। इसके विपरीत हमारे देश में सरे आम वृक्षों को काटा जा रहा है, वन्य जीव-जंतुओं का शिकार किया जा रहा है, फिर भी बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटे जाने या अवैध शिकार के समाचार सुनने-पढ़ने को नहीं मिलते हैं। पर्यावरण की रक्षा के लिए केंद्र व प्रदेशों की सरकारों को भी कड़ाई से पेश आना होगा, ताकि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों में भय पैदा हो। पर्यावरण की रक्षा महज भाषणों और गोष्ठियों से नहीं होती है, यह बात हमें समझनी होगी।
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

समुद्री प्रदूषण
हाल ही में किए एक शोध के अनुसार दुनिया में हर साल करीब तीस करोड़ टन प्लास्टिक कचरा निकलता है, जिसमें से अधिकांश नदियों द्वारा बहा कर लाया जाता है। सिर्फ दुनिया की दस नदियां मिल कर करीब नब्बे फीसद कचरा समुद्र में मिला देती हैं। भारत की गंगा के साथ ही अन्य बड़ी नदियांं लाखों टन कूड़ा-कचरा और अवशिष्ट पदार्थ समुद्र में मिला देती हैं। हालत यह है कि इन पतित पावन नदियों का पानी पीने लायक तो क्या, आचमन लायक भी नहीं रहा। पॉलिथीन के बढ़ते प्रयोग और नदियों के किनारे बढ़ती मानव बस्तियों और कल-कारखानों से निकले अवशिष्ट पदार्थों ने इन नदियों को गंदे नाले में बदल दिया है। अब तो समुद्र के जीव-जंतु भी इस प्रदूषण के शिकार होकर मर रहे हैं।
हाल ही में अमेरिकी खोजकर्ता विक्टर वेस्कोवो दुनिया में पहली बार समुद्र की गहराई में ग्यारह किलोमीटर अंदर तक गए तो उन्हें वहां भी प्लास्टिक का कचरा मिला। प्रशांत महासागर का मारिया ट्रेंच, जो दुनिया में सबसे गहरा समुद्री स्थान कहलाता है, आज कूड़े-कचरे से भरा हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया भर के महासागरों में करीब दस करोड़ टन प्लास्टिक कचरा इकट्ठा हो चुका है और यह बढ़ता ही जा रहा है। इससे हर हाल में शीघ्र ही निजात पाने की जरूरत है।
’संंजय डागा, हातोद, इंदौर

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