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चौपाल: विमर्श की जरूरत व सच के साथ

राजस्थान विश्वविद्यालय में साल-दर-साल परीक्षा फीस में बढ़ोतरी की जा रही है।

Author Published on: November 19, 2019 3:06 AM
। देश के हर व्यक्ति तक जीवन की ये मौलिक सुविधाएं न पहुंचा पाना राज्य की नाकामी है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, उत्तराखंड आयुर्वेद संस्थान, राजस्थान विश्वविद्यालय सहित देश के अनेक शिक्षण संस्थानों में इन दिनों विद्यार्थी पढ़ाई के स्थान पर प्रदर्शनरत हैं। सरकारी नीतियों, मनमानी, बढ़ती फीस आदि कारणों से विद्यार्थियों में असंतोष उपजा है जिसके चलते वे सरकारी शिक्षण संस्थानों में बढ़ते व्यापारीकरण, निजीकरण और स्वयं वित्तपोषित पढ़ाई का एकजुट होकर विरोध कर रहे हैं। भारतीय संविधान कल्याणकारी राज्य की संकल्पना करता है। इसका अर्थ है कि नागरिकों को शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराना राज्य का दायित्व है। देश के हर व्यक्ति तक जीवन की ये मौलिक सुविधाएं न पहुंचा पाना राज्य की नाकामी है। ऐसे में यदि सरकार शिक्षा में भी धंधा करने लग जाए, फायदा-मुनाफा देखकर शिक्षण संस्थान चलाएं तो यह खेदजनक है।

उत्तराखंड के सोलह आयुर्वेदिक महाविद्यालयों के हजारों छात्र-छात्राएं बीते डेढ़ महीनों से नियम-कायदों व नैतिकता को ताक पर रख कर प्रशासन द्वारा की गई फीस वृद्धि के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। धरना-प्रदर्शन के दौरान पुलिस की लाठियां झेल रहे हैं। संवैधानिक तरीके से उच्च न्यायालय में मामला जीतने के बाद भी बढ़ी हुई फीस वापस नहीं हो रही है। इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र अपने उत्तर परिसर स्थित रक्षा मंत्रालय की जमीन को एक निजी बिल्डर को दिए जाने और उस पर 39 मंजिला इमारत बनने के विरोध में हड़ताल पर है। विद्यार्थियों और शिक्षकों का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर में कोई भी निर्माण शुरू करने से पहले विश्वविद्यालय से स्वीकृति लेना जरूरी है, लेकिन बगैर किसी अनुमति के निजी कंपनी यहां निर्माण कर कानून का उल्लंघन कर रही है। चूंकि दिल्ली विश्वविद्यालय के पांच फीसद विद्यार्थियों के लिए ही हॉस्टल सुविधा उपलब्ध है तो छात्र चाहते हैं कि इस जमीन पर हॉस्टल बनना चाहिए।

राजस्थान विश्वविद्यालय में साल-दर-साल परीक्षा फीस में बढ़ोतरी की जा रही है। छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन फीस घटाने की कवायद नहीं कर रहा। ऐसे में देश के सरकारी विश्वविद्यालों में शिक्षा के इस कदर होते व्यापारीकरण से आर्थिक तौर पर कमजोर विद्यार्थियों को बेहतर संस्थान में पढ़ने व उच्च शिक्षा प्राप्ति से वंचित होना पड़ सकता है। वह भी तब जब दुनिया के शीर्ष 300 शिक्षण संस्थानों में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय शामिल नहीं। हमारे केवल 2.5 प्रतिशत कॉलेज पीएचडी करा पाने में सक्षम हैं।

इसी के साथ केवल 0.5 फीसद छात्र शोध शिक्षा हासिल कर पाते हैं। हमारे उच्च शिक्षण संस्थान वैज्ञानिक सोच और शोध विकसित कर पाने में समर्थ नहीं हैं। यही कारण है कि आज देश में उच्च शिक्षा की सुलभता व सुगमता अति आवश्यक है। हर आम व वंचित छात्र से दूर जाती उच्च शिक्षा को बचाना जरूरी है। सस्ती शिक्षा के लिए छात्र-छात्राओं द्वारा किया जा रहा विरोध प्रदर्शन राजनीतिक प्रभुत्व की इच्छाशक्ति के लिए न होकर विश्वविद्यालयी शिक्षा को बचाए रखने के लिए है। अपनी मांगों व विषयों पर अक्सर प्रदर्शन कर विरोध जताने वाले विद्यार्थियों को प्रशासन से तार्किक विमर्श का मौका देना चाहिए।

’कृष्ण जांगिड़, राजस्थान विश्वविद्यालय

सच के साथ

कुछ दिन पहले पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नियामक ने टीवी की बहसों या ‘टॉक शो’ के दौरान उद्घोषकों के विशेषज्ञ के रूप में राय देने पर प्रतिबंध लगा दिया। यह अच्छा कदम है। इन दिनोंं वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से भारत में, देखा जा रहा है कि मीडिया किसी भी मुद्दे पर स्वयं एक निर्णयदाता की शब्दावली का प्रयोग करते हुए तथ्यों को परोसने लगता है। वह खुद ही विशेषज्ञ बन जाता है।

आज की भाग-दौड़ वाली जिंदगी में लोग खबरों की सत्यता तक पहुंचने की जहमत नहीं उठाना चाहते। जो टीवी पर देखा वही मान लिया। यहां तक तो गनीमत है। दिक्कत तब खड़ी हो जाती है जब हम ‘तथाकथित सत्य’ को ‘ध्रुव सत्य’ मानकर प्रतिक्रिया देने लगते हैं। इससे जो पूर्वाग्रह निर्मित होता है वह हमारी एकता में बाधक है।

’विशाल कुमार शर्मा, जेएनयू, दिल्ली

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