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चौपाल: सिर पर मैला

जहां एक ओर सभी राजनीतिक दल दलितों की राजनीति कर अपना वोटबैंक साधने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर यही नेता इस बात को नजरअंदाज करते आए हैं कि मैला ढोने के अमानवीय पेशे में अधिकतर लोग इसी समाज से हैं।

Author May 22, 2019 1:25 AM
सीवर सफाई के दौरान हुई मौतों की खबरें आए दिन अखबारों की सुर्खियों में रहती हैं।

यह शर्मिंदगी की बात है कि देश में आज भी मैला ढोने की प्रथा जारी है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के अलावा अन्य कई राज्यों में अब भी शुष्क शौचालयों का उपयोग होता है और इनमें मानव अपशिष्ट उठाने का काम मानव ही करते हैं, वह भी हाथों और झाड़ू के जरिए। इनके पास कोई खास उपकरण भी नहीं होता है। सीवर सफाई के दौरान हुई मौतों की खबरें आए दिन अखबारों की सुर्खियों में रहती हैं।

जहां एक ओर सभी राजनीतिक दल दलितों की राजनीति कर अपना वोटबैंक साधने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर यही नेता इस बात को नजरअंदाज करते आए हैं कि मैला ढोने के अमानवीय पेशे में अधिकतर लोग इसी समाज से हैं। उनमें से लगभग अस्सी प्रतिशत दलित महिलाएं हैंं। सरकार आंखें मूंदे स्वच्छ भारत अभियान पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है। लेकिन ईमानदार कोशिश के अभाव में यह अच्छा अभियान भी महज टीवी, विज्ञापनों और पोस्टरों तक सिमट कर रह गया है।

योजना आयोग द्वारा 1989 में स्थापित टास्क फोर्स की उप-समिति के अनुसार देश में लगभग बहत्तर लाख सूखे शौचालय थे। देश में लगभग दस लाख ऐसे लोग हैं जो अपने हाथों से मैला ढो रहे हैं। सीवर श्रमिकों की सुरक्षा स्थितियों में सुधार को लेकर कई अदालती निर्देशों के बावजूद खतरनाक कामकाजी परिस्थितियों के कारण सीवर श्रमिकों की मृत्यु की खबरें नियमित रूप से आती रहती हैं। सफाई कर्मचारी आंदोलन के अनुसार 1993 से अब तक उसके पास ऐसे तेरह सौ सत्तर सीवर श्रमिकों के नाम हैं जिनकी मृत्यु काम करने की खतरनाक परिस्थितियों में हुई।

बाकी राज्यों को भी दिल्ली सरकार से सीख लेकर इस प्रथा को समाप्त करने के उपाय करने चाहिए जिससे मानवता को शर्मसार करने वाली इन परंपराओं से समाज को मुक्ति मिल सके। सभी नागरिकों को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है। सिर्फ परिवार पालने के लिए किसी व्यक्ति को मैला ढोना पड़े तो यह सारी व्यवस्था के लिए कलंक की बात है।
’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, नई दिल्ली

ईवीएम के बहाने
आज तमाम विपक्षी दलों के नेता एग्जिट पोल के अनुमानों को गलत बता रहे हैं और साथ में कह रहे हैं कि तेईस मई को दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। वे यह अच्छी बात कह रहे हैं, लेकिन अगर परिणाम इनके खिलाफ आएंगे तो ईवीएम को कोसने लगेंगे; सरकार और निर्वाचन आयोग में सांठगांठ का आरोप लगाएंगे, दिल्ली में धरना देंगे आदि-आदि। यानी चित भी इनकी पट भी इनकी। कहीं तो ठहरिए, चुनाव परिणाम को स्वीकार करना सीखिए; लोकतंत्र का उपहास मत उड़ाइए।

ईवीएम से नतीजे पक्ष में आए तो ईवीएम सही और यदि इसके उलट आए तो ईवीएम को केंद्र सरकार ने हैक करा रखा था! अपनी हार का ठीकरा ईवीएम और निर्वाचन आयोग पर फोड़ना इनकी अयोग्यता ही दर्शाता है कि प्रतिनिधित्व करने के लिए जनता ने इन्हें नकार दिया है। किसी चुनी हुई सरकार को न मानना जनता के मत की अवहेलना है और अलोकतांत्रिक व असंवैधानिक भी है। हो-हल्ला मचाने से नतीजे नहीं बदलने वाले। बेहतर रहेगा, जनादेश का सम्मान किया जाए।
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, दिल्ली

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