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चौपाल: मौद्रिक कवायद

केंद्रीय बैंक जिस वजह से यह कटौती कर रहा है उसका लाभ अर्थव्यवस्था को नहीं मिल पा रहा है। नतीजतन, अर्थव्यवस्था आहिस्ता-आहिस्ता मंदी की तरफ बढ़ रही है।

Author Published on: June 19, 2019 1:51 AM
rbiरिजर्व बैंक (express archive)

क्या रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई द्वारा बार-बार रेपो रेट कम करने से निजी पूंजी निवेश में वृद्धि होगी? पिछले छह महीनों में तीन बार 0.25 फीसद करके ब्याज दर में कटौती की गई। क्या इससे कर्ज लेने वालों को फायदा हुआ? एक अध्ययन के अनुसार बैंकों ने केवल 0.21 फीसद का लाभ ग्राहकों को दिया। इसका कारण भी है। सार्वजनिक क्षेत्र के ज्यादातर बैंकों को अपने फंसे हुए कर्ज यानी एनपीए के कारण जबरदस्त नुकसान हुआ है। आरबीआई की इस कटौती को बैंक अपने घाटे की भरपाई के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए केंद्रीय बैंक जिस वजह से यह कटौती कर रहा है उसका लाभ अर्थव्यवस्था को नहीं मिल पा रहा है। नतीजतन, अर्थव्यवस्था आहिस्ता-आहिस्ता मंदी की तरफ बढ़ रही है।

पिछले मार्च में तिमाही जीडीपी से यह स्पष्ट हो गया है। केंद्रीय बैंक ने भी वित्तीय वर्ष 2020 के लिए जीडीपी के अनुमान को 7.2 से घटाकर सात फीसद कर दिया है। बाजार में ऊहापोह की स्थिति है। निजी पूंजी निवेश गिरता जा रहा है। नए ऋणों की मांग ही नहीं हो रही है। उद्योग क्षेत्र में पूर्ण क्षमता के केवल 75 फीसद का उपयोग हो रहा है क्योंकि बाजार में मांग ही नहीं है। इस स्थिति के लिए केवल वैश्विक कारणों को जिम्मेदार बता कर सरकार पल्ला नहीं झाड़ सकती। अपने दूसरे कार्यकाल में उसे अब गंभीरता से काम करना होगा।
’जंग बहादुर सिंह, गोल पहाड़ी, जमशेदपुर

बड़ा खतरा
पूरे विश्व में सत्रह जून को विश्व मरुस्थल रोकथाम दिवस मनाया गया। इस वर्ष का मुख्य विषय था ‘चलो भविष्य में एक साथ आगे बढ़ें’। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य दुनिया में मरुस्थलीकरण को रोकना है। गौरतलब है कि भारत का लगभग 30 फीसद हिस्सा मरुस्थल में तब्दील हो चुका है। इसका एक बड़ा हिस्सा जल संकट से जूझ रहा है और मौसम में आकस्मिक बदलाव हो रहे हैं। यों तो इस सबके लिए कई कारण जिम्मेदार हैं लेकिन जल की कमी, वृक्षों की कटाई आदि अहम हैं जिनके लिए सिर्फ और सिर्फ मानव जिम्मेदार है। मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन किया जा रहा है जो भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है। वक्त रहते हम पर्यावरण के प्रति जागरूक नहीं हुए तो अपना अस्तित्व बचाने में असमर्थ सिद्ध होंगे।
’सोनू राज, मुखर्जी नगर, दिल्ली

घटता भूजल
जिस प्रकार साल दर साल वर्षा में कमी आ रही है, उसी प्रकार भूजल स्तर में भी कमी आ रही है। भारत के अनेक राज्य पानी की कमी के चलते त्रस्त हैं। इनमें सबसे अधिक महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, ओड़ीशा और बिहार में पीने योग्य पानी के लिए लोग तरस रहे हैं। यहां कुएं सूख चुके हैं, नदियां, तालाब और पानी के अन्य सोते जमींदोज हो चुके हैं। अत्यधिक जलदोहन और समुचित जल संरक्षण के अभाव में जलाभाव की विकरालता आने वाले समय के लिए गंभीर खतरे की घंटी बजा चुकी है। बड़े शहरों और महानगरों में जिस प्रकार भूजल का दोहन हो रहा है और उसे बर्बाद किया जा रहा है, उससे तो इन शहरों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। कुछ अधिक संपन्न लोग अधिक जल बर्बाद करते देखे जा रहे हैं। जमीन के 500 फीट नीचे से भी सबमर्सिबल पंपों द्वारा पानी निकाल कर घरों के फर्शों और गाड़ियों को धोया जा रहा है और बेतहाशा पानी बहाया जा रहा है।

अपवादों को छोड़ दें तो संपन्नता संवेदनशीलता और मार्मिकता में आंशिक कमी ला ही देती है। इनको कोई रोकने वाला नहीं। इन्हें किसी लाइसेंस की आवश्यकता नहीं! इनमें से अनेक वे लोग भी हैं जो भारत के विभिन्न अभियानों के ‘ब्रांड एंबेसडर’ बने हुए हैं। कुछ अधिक दबाव पड़ने पर कार्रवाई के नाम पर इन्हें सौ-पांच सौ का चालान थमा कर इतिश्री समझी जा रही है, लेकिन प्यासे लोग तो हाहाकार कर रहे हैं; मवेशी प्यास से तड़प-तड़प कर मर रहे हैं, मगर इन्हें उससे क्या! इनके फर्श व गाड़ियां तो चमचमाती रहनी ही चाहिए!
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, नई दिल्ली

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