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चौपाल: हिंसा के पीछे

अब यह जरूरी नहीं कि हर हिंसा के पीछे एक खास मकसद पैदा किया जाए या यह पूर्वनिर्धारित होता है। अगर ऐसा होता तो इसकी जद में आए लोगों का चुनाव भी नए आंकड़े और आयाम पैदा करने की चुनौती पेश करता।

Author August 2, 2019 1:59 AM
भीड़ की हिंसा के बाद मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवाई हुई, लेकिन उसे ऐसी प्रवृत्ति पर लगाम लगाने से लेकर आरोपियों को सजा दिलाने तक के मामले में अपर्याप्त माना गया। (File Pic)

भीड़ की हिंसा ऐसी घटना है जिसका स्वरूप संगठनात्मक होता है और जिसकी पहचान एक आदमी के रूप में नहीं हो सकती है। कई बार इस अपराध को किसी विशेष संप्रदाय, समुदाय और उद्देश्य को केंद्र में रख कर परिभाषित करने की प्रवृत्ति विकसित होती रही है। आजकल हर घटना को राजनीतिक और धार्मिक रूप से देखने के नजरिए में इजाफा होता नजर आया है। अब यह जरूरी नहीं कि हर हिंसा के पीछे एक खास मकसद पैदा किया जाए या यह पूर्वनिर्धारित होता है। अगर ऐसा होता तो इसकी जद में आए लोगों का चुनाव भी नए आंकड़े और आयाम पैदा करने की चुनौती पेश करता।

किसी वाहन द्वारा कोई दुर्घटना हो जाती है तो लोग उसके चालक को पीटना शुरू कर देते हैं। उसमें पहले उसकी पहचान तो नहीं की जाती कि वह किस धर्म, जाति, समुदाय या किस विचारधारा का है। भीड़ में लोगों की पहचान करना चुनौती भरा काम है। इसमें हिंसा में भागेदारी करने वालों की उपस्थिति अनचाही और आकस्मिक घटना भी हो सकती है। अब इसे किसी धर्म के नारों, किसी विशेष पंथ और समुदाय से जोड़ना एक सोची-समझी साजिश या प्रस्तुत करने का तरीका हो सकता है।
’गौरव मिश्रा, झांसी

कठघरे में
अब्राहम लिंकन ने कहा था कि लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जहां जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिए सरकार होती है। यहां ‘जनता द्वारा’ का मतलब है कि लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं जो उनके हित के लिए काम करें। लेकिन देश में कुछ जनप्रतिनिधियों के कृत्य भारतीय लोकतंत्र को ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं चाहे वह उन्नाव में विधायक द्वारा बलात्कार का मामला हो, गुजरात में विधायक द्वारा महिला को सारेआम पीटने का या फिर मध्यप्रदेश में विधायक द्वारा सरकारी कर्मचारी को भरे बाजार में क्रिकेट के बल्ले से पीटने का।
’आयुष जगन्नाथ मौर्य, दिल्ली

तब और अब
प्रेमचंद की कहानियां भले ही पुरानी हो गई हों पर उनके पात्र हमारे समाज में आज भी मौजूद हैं। अब आप ही बताइए, क्या जो गरीबी होरी ने गोदान में देखी वह आज समाज से खत्म हो गई है? अंतर आया है तो बस यह कि होरी को अब बैंक खाता, शौचालय और गैस सिलेंडर मिल जाता है। पर क्या सच में मिलता है? नहीं, क्योंकि आज भी समाज में ‘बाबू’ लोग मौजूद हैं जो ऊपरी आय रूपी प्रसाद को ना कहना गुनाह समझते हैं! प्रेमचंद की कहानी ‘नमक का दारोगा’ याद आती है जिसमें अपने पिता की सिखाई हुई ‘व्यावहारिक’ बातों को नजरअंदाज करते हुए वंशीधर बिना कुछ सोचे लक्ष्मी पर अपार भरोसा रखने वाले पंडित आलोपिदीन से भिड़ जाते हैं। उस कहानी में दिखाया गया कि कैसे ईमानदारी का भूत आप पर सवार हो तो भले ही मुहल्ले वाले आपको नासमझ कहें, बाप आपके जैसा बेटा मिलने पर पश्चाताप करे, नौकरी से हाथ धोना पड़े पर आलोपिदीन जैसे लोग भी आपका लोहा मानेंगे और सारी दुश्मनी भुला कर आपको अपना बही-खाता संभालने को कह देंगे। पर अब जमाना बदल गया है।

अब अगर आपने आलोपिदीन जैसों पर सवाल उठाया तो वे आपको बर्बाद करके ही छोड़ेंगे। कैसे? अब आपके दफ्तर पर प्रवर्तन निदेशालय के छापे पड़ सकते हैं, आप पर देशद्रोह का आरोप लग सकता है और अगर आप पत्रकार हैं तो आपको सरकारी विज्ञापनों से वंचित रहना पड़ सकता है। निष्कर्ष यही निकलता है कि प्रेमचंद के जमाने में अगर वजूद की लड़ाई लड़ी जाती थी तो भी विपक्ष का आदर करते हुए। पर अब वह सब नजर नहीं आता।
’आदित्य झा, सीतामढ़ी, बिहार

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