चौपाल: विलय के बाद

उस व्यवस्था में बैंकों में पैसे जमा करने वाले के लिए किसी तरह की सुरक्षा की गारंटी नहीं थी। फिर 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद तो बैंकिंग क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गया।

Author Published on: September 6, 2019 4:15 AM
Bank Holiday

सरकार ने हाल ही में देश के कुछ प्रमुख सरकारी बैंकों के विलय की घोषणा की है। क्या इस विलय की बहुत जरूरत थी? भारत के मौजूदा सामाजिक-आर्थिक हालात को देखते हुए यह सवाल काफी मायने रखता है। आज से पहले इतने व्यापक स्तर पर कभी बैंकों का विलय देखने को नहीं मिला। आजादी के बाद 20 जुलाई 1969 को चौदह बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था। उस फैसले का मकसद अर्थव्यवस्था में कृषि, लघु उद्योग और निर्यात पर अधिक ध्यान देना था। बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पहले भारत की पूरी पूंजी बड़े उद्योगपतियों और औद्योगिक घरानों के जरिए ही नियंत्रित होती थी। उस व्यवस्था में बैंकों में पैसे जमा करने वाले के लिए किसी तरह की सुरक्षा की गारंटी नहीं थी। फिर 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद तो बैंकिंग क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गया।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय कर उनकी संख्या कम कर देने का परिणाम शायद कुछ वक्त बाद ही दिखे या हो सकता है इसका दूरगामी परिणाम भी हमारे सामने आए। विशेषकर मानव संसाधन, रोजगार सृजन और अर्थव्यवस्था के विकास के लिहाज से यह फैसला काफी अहम हो सकता है। लेकिन अगला बड़ा सवाल यह है कि क्या इस विलय के बाद बैंकों की गैर निष्पादित संपत्तियां यानी एनपीए की समस्या सुलझ जाएगी? या उस कर्ज पर नियंत्रण लग पाएगा जिसके वापस मिलने की उम्मीद कम ही है? क्या इस फैसले से बैंकों की काम करने की क्षमता में कुछ सुधार होगा?

दरअसल, इस विलय से बैंकों के काम का स्तर और बढ़ भी सकता है जिसमें कर्ज देने की क्षमता और निवेश भी शामिल होगा तथा देश में वैश्विक स्तर के मजबूत बैंक बनेंगे। लेकिन इसके अपने जोखिम भी हैं। कहीं मजबूत बैंकों के सहारे कमजोर बैंकों को उठाने की जगह ऐसा न हो कि कमजोर बैंक ही मजबूत बैंकों को डुबो दें! दुनिया की चार सबसे बड़ी लेखा संस्थाओं में से एक केपीएमजी के एक शोध के अनुसार 83 फीसद विलय ऐसे रहे हैं जो शेयरधारकों को अधिक मुनाफा देने में नाकाम रहे हैं।
’प्रतीत दहिया, राजकीय महाविद्यालय, बागपत

खतरे की अनदेखी
असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी तैयार करने का एक बड़ा आधार यही था कि राज्य की सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ वहां के मूल निवासियों की पहचान के लिए खतरा पैदा हो गया था। विडंबना यह है कि कई राजनीतिक दल इस खतरे की अनदेखी करने की वकालत कर रहे हैं। यह ठीक नहीं है। आज जब हर देश अपने और विदेशी नागरिकों की पहचान सुनिश्चित कर रहा है तब भारत को भी यह तय करना चाहिए कि देश में रहने वाला कौन भारतीय है और कौन नहीं? चूंकि यह पहचान तय करना वक्त की मांग है इसलिए एनआरसी का काम उदाहरण पेश करने वाला होना चाहिए। इसी से एनआरसी पर हो रही राजनीति थमेगी।
’हेमंत कुमार, गोराडीह, भागलपुर, बिहार

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