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चौपाल: शहादत और सियासत

नेताओं के देशप्रेम का आलम यह है कि बेगूसराय के शहीद पिंटू सिंह के पार्थिव शरीर के साथ पूरा शहर सड़कों पर उमड़ा हुआ था मगर बिहार के मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक गांधी मैदान में चुनावी रैली में व्यस्त थे।

pintu singh, pintu singh crpf, pintu singh patna, kupwara encounterसीआरपीएफ जवान पिंटू सिंह जम्‍मू-कश्‍मीर के कुपवाड़ा में आतंकियों संग मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए थे। (Photo : PTI)

वायुसेना प्रमुख के जवाब ने बयानवीर नेताओं को एक तरह से बेइज्जत कर दिया। सवाल पूछा गया था कि पाकिस्तान में किए गए हवाई हमले में कितने आतंकी मारे गए? उनका सीधा जवाब था- ‘कितने टारगेट हिट करने हैं हम ये देखते हैं, लाशें गिनना हमारा काम नहीं है।’ पिछले दिनों कुछ नेता लाशें गिनने में जुटे थे। एक गुट वाले नेता लाशें गिन कर नंबर बढ़ा रहे थे ताकि सीटें उसी अनुपात में बढ़ जाएं तो दूसरे गुट वाले उस कैलकुलेटर का पता मांग रहे थे जिस पर लाशों की संख्या का कुल योग निकाला गया था ताकि पहले गुट की सीटें घटा सकें!

हद दर्जे का तमाशा चल रहा है देश में! अरे भाई, तीनों सेनाओं की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी लाशों की गिनती नहीं बताई गई थी..तो क्यों इसमें उलझे पड़े हैं? जो सेना का काम है, जो विदेश मंत्रालय का काम है, जो रक्षा मंत्रालय का काम है, उसमें ये राजनीतिक दलों के नेता क्यों बयानबाजी कर रहे हैं? कितना मजाकिया लग रहा है कि एक कह रहा है साढ़े तीन सौ, दूसरा ढाई सौ, तीसरा पूछ रहा है किसने कहा, कैसे पता? चौथा कह रहा है- फोटो, वीडियो तो दिखवा दो…! और इससे भी ज्यादा मजाकिया यह लगता है कि दोनों ही गुट एक-दूसरे को कह रहे हैं कि वे देशहित पर राजनीति न करें!

दूसरी तरफ नेताओं के देशप्रेम का आलम यह है कि बेगूसराय के शहीद पिंटू सिंह के पार्थिव शरीर के साथ पूरा शहर सड़कों पर उमड़ा हुआ था मगर बिहार के मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक गांधी मैदान में चुनावी रैली में व्यस्त थे। ठीक है कि नेताओं का असली प्रेम राजनीति, चुनाव, वोट ही होता है और यह सोच रही होगी कि शहादतें तो होती ही रहती हैं, चुनाव तो पांच साल में एक बार ही आते हैं लिहाजा पहले इसी को तवज्जो दी जाए! लेकिन कम से कम एक मंत्री को तो सरकार का प्रतिनिधि बना कर शहीद पिंटू सिंह के अंतिम संस्कार में भेजा ही जा सकता था। यह बेहद अफसोसनाक है कि जिस मंच से बिहार के शहीदों को प्रधानमंत्री ने नाम ले-लेकर नमन किया, उसी मंच पर मौजूद बिहार के एक भी मंत्री को यह खयाल तक नहीं आया कि शहीद पिंटू सिंह की अंत्येष्टि में भी जाकर हाजिरी ही लगवा आता। यहां गांधी मैदान की हाजिरी ज्यादा जरूरी महसूस की गई!

यह बेहद दुखद है कि हमारे देश के नेता, चाहे वे किसी भी दल के हों, चुनाव और सत्ता से आगे इनकी सोच जा ही नहीं पाती, जबकि यह वक्त देश को सर्वोपरि रखने का है। सेनाओं का मनोबल क्या जुबानी भाषण से बढ़ेगा, जब शहीद का परिवार देखे कि जिसने अपने प्राणों का बलिदान देश के लिए दिया, उसके लिए देश तो छोड़िए, राज्य की सरकार के एक भी मंत्री तक को अंतिम विदाई में जाने की भी फुर्सत नहीं है।
मो. ताबिश, जामिया मिल्लिया, नई दिल्ली

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