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चौपाल: भाषाई गुलामी, विकल्प की दरकार व हिंदी के साथ

हिंदी दिवस मनाना तभी सार्थक हो सकता है जब हम प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को सही रूप में हिंदी भाषा सिखा सकें।

Author Published on: September 14, 2019 2:52 AM
सांकेतिक तस्वीर।

आजादी के बहत्तर साल बाद भी भाषाई तौर पर हम अंग्रेजी और अंग्रेज मानसिकता की गुलामी से नहीं उबर पाए हैं। ‘देवनागरी लिपि में हिंदी भारत की राजकीय भाषा होगी’ भारतीय संविधान की धारा 343 की इस घोषणा के बाद भी हमारे यहां प्राथमिक व उच्च शिक्षा व्यवस्था से लेकर प्रशासनिक व न्यायिक व्यवस्था तक में अंग्रेजी भाषा का ही वर्चस्व बना रहना बेहद अफसोसनाक है। आज भले ही हम हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़ा व हिंदी सप्ताह जैसे कई रस्म अदायगी वाले कार्यक्रम आयोजित कर लें मगर सच यही है कि हिंदी के प्रति हमारी दकियानूसी सोच ने इसे अंग्रेजी की दासी बना रखा है। हिंदी दिवस पर महज औपचारिकता पूर्ति की जगह सरकार व समाज दोनों को साथ मिलकर हिंदी को उसका समुचित हक दिलाने में मदद करनी चाहिए। हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए हम सबको एक साथ मजबूत इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है।

’अंकित कुमार मिश्रा, अजीम प्रेमजी विवि, बंगलुरु

विकल्प की दरकार

प्रधानमंत्री 2022 तक देश को प्लास्टिक मुक्त करने का दावा कर रहे हैं। क्या यह संभव है? एकल इस्तेमाल प्लास्टिक भी तभी हटाया जा सकता है जब हम उसका विकल्प खोज लेंगे। सिर्फ खोजने से काम नहीं चलेगा उसकी लागत को भी नियंत्रण में रखना पड़ेगा। प्लास्टिक हमारी दिनचर्या का अंग बन गया है। इसमें दवाएं रखी जाती हैं, इसमें पानी रखा जाता है। मशीनों के कलपुर्जों के रूप में यह इस्तेमाल होता है।

खाने की चीज नरम न हो जाए उसकी पैकिंग में इसे काम में लाया जाता है। सबसे बड़ी बात इस उद्योग में निवेशकों ने करोड़ों रुपए लगाए हैं। लाखों लोगों को रोजगार मिला हुआ है। झट से बंद कर देने का आदेश दे देना उचित नहीं होगा। हमें हर पहलू पर मंथन कर लेना चाहिए क्योंकि यह एक वैश्विक समस्या है। दुनियाभर में लगभग 300 लाख टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है। इसमें से 130 लाख टन से ज्यादा प्लास्टिक समुद्र और नदियों में बहा दिया जाता है। सरकार प्रतिबंध जरूर लगाए मगर इसके नफा-नुकसान के बारे में सोच कर।

’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

हिंदी के साथ

हर वर्ष चौदह सितंबर को हम रस्मी तौर पर हिंदी दिवस मनाते हैं पर खेद की बात है कि हिंदी को सही ढंग से बोलने, लिखने और पढ़ने के प्रति हमारा रुझान कम होता जा रहा है। शुद्ध हिंदी लेखन, व्याकरण और हिंदी साहित्य के इतिहास के बारे में नई पीढ़ी को नहीं के बराबर जानकारी है। राज्य सरकार का कामकाज तो हिंदी में हो रहा है पर केंद्र सरकार के विभागीय परिपत्रों में आज भी अंग्रेजी का ही बोलबाला है। हिंदी उत्तर भारत की एक प्रमुख भाषा है जिसे सभी जानते और समझते हैं। यह भाषा सहज-सरल है। हिंदी दिवस मनाना तभी सार्थक हो सकता है जब हम प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को सही रूप में हिंदी भाषा सिखा सकें। उच्च शिक्षा भी हिंदी में दी जानी चाहिए।

विदेशों में हिंदी सीखने की ललक बढ़ रही है और वे इसके लिए तरह-तरह के जतन कर रहे हैं पर हमारे देश में ही राष्ट्रभाषा की उपेक्षा होना समझ से परे है। हमारा दायित्व बनता है कि हिंदी भाषा अपनाने के लिए अपने बच्चों को प्रेरित करें। अपने कामकाज में हिंदी को शामिल करें। विज्ञापनों का लेखन हिंदी में हो। अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त करना अच्छा है पर उसे हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

’ललित महालकरी, इंदौर, मध्यप्रदेश

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