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चौपाल: मजदूरों की जान

आखिर क्यों नहीं ऐसे हादसों से सबक लेते हुए कुछ फैक्टरी, कारखानों या अन्य संस्थान अपने यहां आग, भूकम्प या अन्य हादसों से निपटने के लिए पुख्ता इंतजाम करते हैं?

अब इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद फिर से सरकार, प्रशासन और अन्य लोग कुंभकर्णी नींद से जागेंगे।

रविवार दिल्ली में एक फैक्ट्री में काम करने वालों और उनके परिवार वालों के लिए त्रासद दिन बन गया। रिहायशी इलाके में चल रही एक फैक्ट्री में आग लगने से अंदर सो रहे उनसठ में से लगभग तैंतालीस लोगों को सरकार, प्रशासन और अन्य भ्रष्ट अधिकारियों की लापरवाही ने मौत की नींद सुला दिया। लेकिन जिस देश में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर हो, जहां सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार के दलदल में बुरी तरह धंसा हो, वहां भविष्य में भी ऐसी लापरवाही से होने वाले हादसों पर शायद ही लगाम लगे, क्योंकि यहां पैसे के गोरखधंधे के लिए अवैध और असुरक्षित निर्माणों पर कोई काबू नहीं है।

यहां सवाल यह भी खड़ा होता है कि जो लोग करोड़ों की बहुमंजिला इमारत बनाने और इन इमारतों से कमाई के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर देते हैं, वे महज कुछ लाख रुपए आग से बचाव के साधनों पर क्यों नहीं खर्च करते? अब इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद फिर से सरकार, प्रशासन और अन्य लोग कुंभकर्णी नींद से जागेंगे। इस घटना की जांच के आदेश देकर और कुछ मुआवजे का मरहम लगा कर अगले किसी ऐसे दिल दहलाने वाले हादसे के इंतजार में लंबी तान के सो जाएंगे। लेकिन ऐसे हादसे क्यों होते रहते हैं? इनके लिए कौन-सी लापरवाहियां जिम्मेदार हैं? आखिर क्यों नहीं ऐसे हादसों से सबक लेते हुए कुछ फैक्टरी, कारखानों या अन्य संस्थान अपने यहां आग, भूकम्प या अन्य हादसों से निपटने के लिए पुख्ता इंतजाम करते हैं?

या फिर यह समझा जाए कि ऐसी लापरवाही बरतने वालों को मजदूरों और कामगारों की जान की परवाह नहीं होती है? ऐसे लोगों से एक सवाल है कि क्या मजदूर और कामगार इंसान नहीं? मजदूरों के बिना कोई भी उद्योग तरक्की की राहों मे नहीं जा सकता है और देश के विकास में मजदूरों का भी बहुत बड़ा योगदान होता है। इनके वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए इनके हक में श्रम सुधारों की बहुत जरूरत है। अभी भी हमारे देश में बहुत से स्थानों पर इनका शोषण होता है। लेकिन इसके उलट श्रम सुधारों की मौजूदा दिशा मजदूर विरोधी है। सरकारों के प्रयास भी तभी सार्थक होंगे, जब इसके लिए भ्रष्टाचार को समाप्त करने के उपाय भी किए जाएं।

’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

कठघरे में व्यवस्था

दस दिसंबर को सभी देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है, क्योंकि 1945 में इसी दिन संयुक्त राष्ट्र के मंच पर मानवाधिकारों का सार्वभौमिक घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया था। उसमें व्यक्ति के मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता को बढ़ावा और सुरक्षा देना प्रमुख है। लेकिन हाल में पुलिस पर हैदराबाद मुठभेड़ को लेकर लोगों ने मानवाधिकार के हनन का आरोप लगाया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसकी जांच के आदेश भी दिए हैं।
मानवाधिकार दिवस मानाने से हमारा तात्पर्य लोगों को अधिक से अधिक उनके अधिकारों के बारे में बताना होता है। हैदराबाद में जो कुछ हुआ, वह सब कानून के मुताबिक न होकर सिर्फ भावनाओं को लेकर किया गया फैसला है। स्वाभाविक ही मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। लेकिन कुछ लोगों ने पुलिस के कदम को सही ठहराया और उसे ‘डिवाइन जस्टिस’ या ‘दैवी न्याय’ कहा। सवाल है कि संविधान और नियम-कायदों से चलने वाले किसी सभ्य समाज में यह सजा देने का तरीका क्या सही है?

मेरा साफ मानना है कि नहीं। यह बेमानी दलील दी जाती है कि अगर आपकी बहन या बेटी के साथ ऐसा होता तो आप क्या करते? दिक्कत पुलिस के काम करने के तौर-तरीके और न्यायपालिका की मंद गति में छिपी है। इसके लिए किसी व्यक्ति के निजी आग्रहों को दलील नहीं बनाया जा सकता। व्यवस्था में ऐसा सुधार किया जाना चाहिए, ताकि लोगों का भरोसा इस पर कायम हो। कानूनों के साथ खिलवाड़ करने वाले अपराधियों के साथ-साथ पुलिसकर्मियों को भी कठघरे में खड़ा किया जाए।

’संदीप कुमार, प्रयागराज

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