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चौपाल: हार की सीख

कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट है 134 सालों का इसका इतिहास, जिसके बोझ से वह निकल नहीं पा रही है बल्कि दब कर खत्म होती जा रही है।

Author June 12, 2019 1:29 AM
मां और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से बातचीत करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल। (फोटोः पीटीआई)

देश की सबसे पुरानी पार्टी लगातार दो लोकसभा चुनावों में मुख्य विपक्षी दल बनने लायक सीटें भी नहीं जीत सकी है। ऐसे में पार्टी की रीति-नीति पर सवाल तो उठेंगे ही। कांग्रेस वह संगठन है जिसके खाते में देश की आजादी में अग्रणी होने की भूमिका दर्ज रही है। चुनाव दर चुनाव पार्टी ने इसे भुनाया भी है और भुनाते-भुनाते अपने मतदाताओं को बुरी तरह से ऊबा दिया है। भूमंडलीकरण, मंडल और कमंडल के बाद से देश की सियासत जमीन से लेकर शीर्ष तक पूरी तरह बदल चुकी है लेकिन कांग्रेस आज भी अपने पुराने मुद्दों को बेचने में लगी हुई है जबकि देश में उन मतदाताओं की संख्या अब मुट्ठी भर ही रह गई है जिन्होंने आजादी की लड़ाई को देखा होगा और उस दौर के आदर्शों में जीते रहे होंगे।

आज मतदान में हिस्सा लेने वाली बहुसंख्यक आबादी वह है जिसने बाबरी ढांचा टूटने, बाजार के खुलने और अन्य पिछड़ा वर्ग के सियासी उभार के बाद जन्म लिया है या होश संभाला है। इस वर्ग की आकांक्षाएं दूसरी हैं जिन्हें संबोधित करने में कांग्रेस अब विफल साबित हो रही है। कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट है 134 सालों का इसका इतिहास, जिसके बोझ से वह निकल नहीं पा रही है बल्कि दब कर खत्म होती जा रही है। अगर 134 साल की विरासत का दावा करना ही है तो वही परंपरा दोबारा शुरू करे जब साल भर पर कांग्रेस का अधिवेशन बुलाया जाता था और लोकतांत्रिक तरीके से एक साल के लिए ही अध्यक्ष का चुनाव होता था। तब इसके ढेर सारे अनुषांगिक संगठन हुआ करते थे और उनमें काम करके आए लोगों को टिकट दिए जाते थे। आज जरूरत है कि नेहरू-गांधी परिवार मोह छोड़े और बिना पद के काम करे। इससे न सिर्फ एकरसता टूटेगी बल्कि एक परिवार से इतर कांग्रेस अधिक बड़ी भी दिखाई देगी। अगर उनमें (गांधी-नेहरू परिवार) क्षमता हुई तब नए दल में भी उनकी मजबूत स्थिति बनी रहेगी अन्यथा अपने आभामंडल के इर्द-गिर्द पार्टी खड़ी करने और दिल्ली के ड्रॉइंग रूम में बैठने वाले बुद्धिजीवियों के सहारे अब सियासी दल नहीं चल सकेंगे।

बुद्धिजीवियों के सहारे चलने वाले साम्यवादी दलों का हश्र हम देख चुके हैं, परिवार प्रधान दलों की हालत भी देख ही रहे हैं। आज भारत की राजनीति का भाजपा युग है जिसमें मोटी-मोटी किताबें पढ़ कर भारत का विचार समझने-समझाने वाले लोग नहीं बल्कि घर-चौपालों तक काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज है। वहां नेताओं का व्याकरण और भाषा कोई नहीं जांचता क्योंकि गलतियां करते इसके नेता इस दल को वोट देने वाली बहुसंख्यक जनता को अपने जैसे लगते हैं जहां पार्टी हित में पीढ़ी परिवर्तन हो गया और इसके समर्थकों को यह बुरा भी नहीं लगता। दूसरी ओर कांग्रेस अब भी धर्मनिरपेक्षता-समाजवाद पर अटकी हुई है। इन सत्तर सालों में कांग्रेस ने भारत को परिभाषित किया तो दूसरी ओर इन्हीं सालों में भारत ने भी खुद को नए ढंग से समझा है, व्यावहार किया है। इन दोनों परिभाषाओं और व्यवहारों में एक बड़ा अंतर है। आज कांग्रेस को सत्तर साल में बने भारत और उसके अनुभवों के आधार पर खुद को नए ढंग से परिभाषित और पेश करने की जरूरत है।
’अंकित दूबे, आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली

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