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चौपाल: घाटे का खत

‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक 1854 से चल रहे भारतीय डाक में घाटे के कारणों में से एक पोस्टकार्ड, पार्सल, बुक पोस्ट, स्पीड पोस्ट और दूसरी सेवाओं में दी जानी वाली सब्सिडी भी है।

Author Published on: June 11, 2019 2:18 AM
ममता बनर्जी और पीएम मोदी। (image source-PTI)

लोकसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद भी पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। भाजपा के नेता और कार्यकर्ता जहां तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ‘जय श्रीराम’ लिखे दस लाख पोस्टकार्ड भेज रहे हैं तो वहीं तृणमूल कांग्रेस, भाजपा के नेताओं को ‘जय बांग्ला, जय काली’ लिखे बीस लाख पोस्टकार्ड भेज रही है। इस पूरी सियासी कवायद में लगभग 30 लाख पोस्टकार्ड दोनों दल एक-दूसरे को भेज रहे हैं। एक खबर के अनुसार दोनों दलों की इस राजनीतिक लड़ाई में केंद्र सरकार को 3.53 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। यह पैसा देश की जनता का है जिससे दोनों दल अपना सियासी हित साध रहे हैं।

डाक विभाग की 2017 की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक पोस्टकार्ड पर सरकार की लागत 12.15 रुपए आती है लेकिन वह जनता के हित के लिए इसे सिर्फ पचास पैसे में भेजती है। यानी हर पोस्टकार्ड पर सरकार को 11.75 रुपए का घाटा उठाना पड़ता है। यह घाटा सरकार जनता को सुविधा देने के लिए उठाती है। अब अगर दोनों दल अपनी राजनीतिक लड़ाई पोस्टकार्ड के जरिए लड़ेंगे तो इससे केंद्र सरकार को 3.53 करोड़ रुपए का घाटा होगा। इसी साल अप्रैल में खबर आई थी कि डाक विभाग भारी घाटे में है। बताया गया था कि सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों में भारतीय डाक का घाटा सबसे अधिक हो गया है। ‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक 1854 से चल रहे भारतीय डाक में घाटे के कारणों में से एक पोस्टकार्ड, पार्सल, बुक पोस्ट, स्पीड पोस्ट और दूसरी सेवाओं में दी जानी वाली सब्सिडी भी है।
’प्रियंवदा, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

 

धनतंत्र
भारत में चुनाव कराना अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती है। जनसंख्या उस चुनौती को और बढ़ा रही है। चुनाव खर्च 62 साल में 370 गुना बढ़ गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस खर्च ने 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को पीछे छोड़ दिया है। बढ़ते चुनाव खर्च को देखते हुए इस बात पर चिंता व्यक्त की जाने लगी है कि क्या संसद में सिर्फ वही लोग पहुंच सकते हैं, जिनके पास पैसा है? क्या अमीर ही जनता का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं? इन सबके लिए चुनाव आयोग भी सवालों के घेरे में है जिसने चुनाव आचार संहिता के नियम 90 में हाल ही में परिवर्तन किया है। आयोग ने लोकसभा और विधानसभा के लिए चुनाव खर्च की सीमा को बढ़ा दिया है। अगर चुनाव खर्च पर लगाम नहीं लगाई गई तो लोकतंत्र सिर्फ पैसे वालों का तंत्र बन कर रह जाएगा।
’तानिया पाठक, केएमवी, जालंधर

हिंदी के सहारे
यदि हिंदी की उपयोगिता को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार की कोई पहल की जाती है तो आखिर इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? आपत्ति करने वालों को इस सच्चाई से परिचित होना चाहिए कि दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के लोगों के लिए हिंदी एक आवश्यकता बन गई है। आज जब नौकरी, व्यापार आदि के कारण हर प्रांत के लोगों की देश के दूसरे हिस्सों में आवाजाही और साथ ही बसाहट बढ़ती जा रही है तब यह समय की मांग है कि संपर्क भाषा का पर्याय बन गई हिंदी को सहर्ष अपनाया जाए। कई राज्यों ने ऐसा ही किया है और इनमें अरुणाचल सबसे बढ़िया उदाहरण है। इस उदाहरण की अनदेखी करना सच से मुंह मोड़ना ही है।
’हेमंत कुमार, गोराडीह, भागलपुर, बिहार

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