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चौपाल: खतरे की दस्तक

जलवायु परिवर्तन ने कपास, गेहूं, धान और दलहनी फसलों को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है। विभिन्न अनुमानों के अनुसार 2050 तक गंगा के मैदानी भाग में गेहूं के उत्पादन में 51 फीसद तक गिरावट आएगी।

Author March 12, 2019 3:36 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

इक्कीसवीं सदी की दुनिया को जितना खतरा आतंकवाद से है उतना ही जलवायु परिवर्तन से भी है। जलवायु परिवर्तन इक्कीसवीं सदी का सबसे ज्वलंत वैश्विक मुद्दा है। विश्व के पर्यावरणविद, वैज्ञानिक, राजनेता व पत्रकार इसके बढ़ते दुष्प्रभावों से चिंतित हैं। जलवायु परिवर्तन मौसमी दशाओं में होने वाले असामान्य ऐतिहासिक परिवर्तन को कहते हैं। इसके लिए प्राकृतिक कारण और मानवीय क्रियाकलाप समान रूप से जिम्मेदार हैं। ग्रीनहाउस गैसों ने भी जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रस आॅक्साइड, ओजोन और क्लोरो-फ्लोरो कार्बन शामिल हैं।

इंग्लैंड से प्रारंभ हुई औद्योगिक क्रांति ने भले ही मानव सभ्यता को विकासोन्मुख कर दिया, पर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस क्रांति के दुष्परिणाम स्वरूप उत्पन्न जलवायु परिवर्तन के कारण संपूर्ण ब्राह्मांड विनाश के कगार पर खड़ा है। पृथ्वी के वायुमंडल में ग्रीनहाउस और कार्बन डाई आॅक्साइड के उत्सर्जन की मात्रा में वृद्धि से पृथ्वी के तापमान में हुई वृद्धि के कारण कई गंभीर पर्यावरणीय खतरे उत्पन्न हो गए हैं। गौरतलब है कि सूखा, बाढ़, तूफान, चक्रवात और वर्षा के असमान वितरण का कारण जलवायु परिवर्तन ही है। इसके चलते कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि; और कहीं-कहीं तो सूखे जैसे हालात भी पैदा हो जाते हैं। मौसम में होने वाले असमान परिवर्तन किसानों और फसलों को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। जलवायु परिवर्तन में कृषि चक्र के स्वरूप में बदलाव होने के कारण फसलों की उत्पादकता घटने लगती है। उत्पादकता घटने से भुखमरी और कुपोषण की समस्या विकासशील देशों की प्रगति में रुकावट पैदा कर देती है।

जलवायु परिवर्तन ने कपास, गेहूं, धान और दलहनी फसलों को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है। विभिन्न अनुमानों के अनुसार 2050 तक गंगा के मैदानी भाग में गेहूं के उत्पादन में 51 फीसद तक गिरावट आएगी। चारे से संबंधित अनाज के उत्पादन में 2020 तक दो से 14 फीसद तक की गिरावट आएगी, जिसके 2050 तक अत्यधिक निम्न स्तर पर पहुंचने की आशंका है। फसलों की उत्पादकता घटने से 2050 तक खाद्य पदार्थों के उत्पादन में 18 फीसद तक गिरावट आएगी। इसके कारण भुखमरी और कुपोषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे भारतीयों को बमुश्किल दो जून की रोटी मयस्सर हो पाएगी। यहीं नहीं जलवायु परिवर्तन के प्रभाव संपूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था के लिए काफी नुकसानदेह होंगे।

वायुमंडल का तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघल रहे हैं नतीजतन, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। शोध पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार अंटार्कटिका की अपेक्षा पेंटागोनिया में ग्लेशियर 100 से 1000 गुना तेजी से पिघल रहे हैं। एशियाई विकास बैंक का अनुमान है कि इस शताब्दी के अंत तक समुद्री जलस्तर 40 सेंटीमीटर तक बढ़ जाएगा जिससे समुद्री क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन के लिए खतरा उत्पन्न हो जाएगा। जलवायु परिवर्तन के चलते उत्पन्न बाढ़ से आधारभूत संरचना, आजीविका और आवास व्यवस्था चौपट हो जाएगी जिसका खमियाजा मुंबई और कोलकाता जैसे विकसित समुद्रतटीय नगरों को भुगतना पड़ेगा। गर्मी से मानव मृत्यु दर में वृद्धि होगी और सूखे से जल और भोजन की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाएगी। आखिर इतने बड़े खतरे से हम कब तक आंखें मूंदे रहेंगे?
’कुंदन कुमार, बीएचयू, वाराणसी

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