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चौपाल: संवेदनहीनता की इंतहा व कसौटी पर एकता

देश की वित्त मंत्री कितनी आसानी से यह कह देती हैं- ‘मैं इतना लहसन-प्याज नहीं खाती हूं।

Author Published on: December 12, 2019 3:36 AM
देश की वित्त मंत्री कितनी आसानी से यह कह देती हैं- ‘मैं इतना लहसन-प्याज नहीं खाती हूं।

आज के भारत की राजनीतिक जमात प्राचीन समय में फ्रांस में उस दौर की याद दिला रही है, जब वहां पड़ी भयंकर अकाल में जनता भूखों तिल-तिल कर मरने लगी, तब वहां की जनता के कुछ प्रतिनिधि उस समय की फ्रांस की तत्कालीन महारानी से इस दुखद और कारुणिक स्थिति के बारे में बताने गए। जब वे लोग महारानी के राजदरबार में पहुंचे, तब एक व्यक्ति डरते-डरते महारानी से अपने कांपते होठों से बोला कि ‘महारानी साहिबा ! बाहर भयंकर अकाल पड़ा हुआ है, लोग रोटी न मिलने से तिल-तिल कर मर रहे हैं।’

विलासिता और ऐशो-आराम में जिंदगी जीने वाली फ्रांस की महारानी चहक कर बोली- ‘लोग रोटी के लिए क्यों मर रहे हैं? वे ब्रेक ‘केक’क्यों नहीं खाते! ह्य आज 2019 में भारत में सत्ता के कर्णधारों की मानसिक स्थिति क्या प्राचीनकाल के उस फ्रांस की महारानी जैसी नहीं हो गई है? देश की वित्त मंत्री कितनी आसानी से यह कह देती हैं- ‘मैं इतना लहसन-प्याज नहीं खाती हूं। इसलिए घबराएं नहीं! मैं ऐसे परिवार से आई हूं, जहां प्याज का मतलब ही नहीं रखते हैं।’ अब प्रश्न यह है कि भारत की वित्त मंत्री क्या देश की जनता की समस्याओं को केवल अपने और अपने परिवार तक सीमित रखती हैं तो क्या उन्हें ऐसे बयान देना चाहिए था?

’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

कसौटी पर एकता

नागरिकता संशोधन विधेयक जब संसद से पास होकर पूरी तरह कानून बन जाएगा, तब क्या भारत की अनेकता में एकता पर सवाल नहीं उठेगा? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ना ज्यादा मुश्किल नहीं है। बस जिन लोगों पर इसका असर पड़ेगा, उनकी जगह पर खुद को रख कर देखना होगा और जवाब मिल जाएगा। जो हो, इस बिल के पारित होने के बाद जब यह कानून का रूप ले लेगा, तब भारत में जो परिवर्तन होगा, उसे तो हम समझ जाएंगे, लेकिन भारत के बाहर यानी बांग्लादेश और पाकिस्तान में जो हिंदू हैं, उन पर इसका क्या असर होगा, इसे भी समझना जरूरी होगा। इस बिल को अपनाने के साथ कहीं हम जिन्ना की ‘टू नेशन थ्योरी’ यानी ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ को तो नहीं अपना रहे?

इस पर विचार करना जरूरी है, क्योंकि इसका परिणाम अंत में आम आदमी को ही भुगतना है। इस बिल के पास होने के बाद भविष्य में एक बहुत बड़ी आबादी की अदला-बदली की नौबत आ सकती है। किसे कहां भेजा जा सकेगा या कहां किस रूप में रखा जाएगा, ये सवाल जटिल हालात पैदा करेंगे। उम्मीद है कि यह समूचा प्रकरण देश में किसी वैसे अदृश्य विभाजन की शक्ल न ले, जिसके बाद देश की एकता और अखंडता पर कोई आंच आए।

’भूपेंद्र सिंह रंगा, पानीपत, हरियाणा

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