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चौपाल: परिवार की सुध

बढ़ती जनसंख्या, जलवायु परिवर्तन, सतत धारणीय विकास अंतरराष्ट्रीय स्तर के गंभीर मुद्दे हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए वसुधैव कुटुंबकम के नीति पर चलना आवश्यक हो गया है।

तस्वीर में चाय बागान मजदूर शंकर देहरी उनकी पत्नी सुर्जी और बच्चे हैं। (एक्सप्रेस फोटो/पार्थ पॉल)

हर साल पंद्रह मई को अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है। यह दिवस मनाने की घोषणा 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसलिए की थी इससे समाज की बुनियादी इकाई के रूप में परिवारों के महत्त्व को रेखांकित किया जाएगा। इसके अलावा यह दिवस दुनिया भर में परिवारों की स्थिति के बारे में चिंता व्यक्तकरता है। इस वर्ष की थीम ‘परिवार और जलवायु कार्रवाई’ है। इस विषय के बारे में जागरूकता का प्रसार कार्यशाला, सम्मेलन, टीवी-रेडियो, लेखों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से किया जाएगा। दुनिया भर के परिवारों के बेहतर जीवन मानकों और सामाजिक प्रगति को प्रोत्साहित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने दृढ़ संकल्प लेकर इस दिवस को महत्व प्रदान किया है।

आज विश्व के सामने बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन प्रमुख चिंता हैं। फरवरी 2019 तक दुनिया की आबादी ने 7.71 अरब का आंकड़ा पार कर लिया है और यह दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की 2019 की रिपोर्ट के हिसाब से भारत की अनुमानित जनसंख्या 1350438098 है और यह 1.19 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। इसके मद्देनजर देश में परिवार नियोजन के बारे में जागरूकता लाना जरूरी हो गया है क्योंकि जनसंख्या के मुकाबले संसाधनों की भारी कमी की वजह से दुनिया गरीबी, बीमारी, पानी के अभाव जैसी समस्याओं से जूझ रही है। जलवायु परिवर्तन आज दुनिया के सामने एक बड़ा संकट बनता जा रहा है और 2018 की अंतर सरकारी पैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया को औसत तापमान 1.5 डिग्री से ज्यादा नहीं बढ़ने देना चाहिए। अगर हम औसत तापमान 1.5 डिग्री से ज्यादा बढ़ने देंगे तो भविष्य में इसके दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे।

इस स्थिति से निपटने के लिए विश्व को नैसर्गिक पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होकर इसकी रक्षा के लिए कड़े और गंभीर कदम उठाना जरूरी है। आज सतत विकास लक्ष्यों के पूर्ति के लिए दुनिया के देशों को गंभीरता से प्रयत्न करने के लिए प्रतिबद्ध होना भी आवश्यक है। ये लक्ष्य तभी पूरे किए जा सकेंगे जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर सभी देश ईमानदारी से आपस में सहयोग और एकजुटता से प्रतिबद्ध होंगे। बढ़ती जनसंख्या, जलवायु परिवर्तन, सतत धारणीय विकास अंतरराष्ट्रीय स्तर के गंभीर मुद्दे हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए वसुधैव कुटुंबकम के नीति पर चलना आवश्यक हो गया है।
’निशांत महेश त्रिपाठी, कोंढाली, नागपुर

जिम्मेदारी के साथ
सन 1984 के सिख विरोधी दंगे आज भी सबके दिलों में जख्म के रूप में जिंदा हैं। पर लगता है, कांग्रेस सरकार के समय में हुए उन दंगों का कांग्रेस को कोई दुख नहीं है। कांग्रेस के एक बड़े नेता सैम पित्रोदा ने बयान दिया है कि 84 में जो दंगा हुआ तो हुआ! इस तरह का असंवेदनशील बयान कोई कैसे दे सकता है! जिन दंगों में हजारों बेगुनाह लोगों को मार दिया गया, उन पर ऐसा गैरजिम्मेदार बयान नहीं देना चाहिए। नेताओं को हमेशा जिम्मेदारी के साथ बोलना चाहिए।
’बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद

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