ताज़ा खबर
 

चौपाल: लोकतंत्र के हक में

समाज, राजनीति, बुद्धिजीवियों की दुनिया- किसी ओर से भी सरकार से हिसाब नहीं मांगा जा रहा है।

Author Published on: December 10, 2019 3:07 AM
दिल्ली के अनाज मंडी अग्निकांड के बाद एक खौफनाक मंजर है, जहां कुछ सिसकियों को छोड़ कर सब कुछ खामोश है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लेकिन सच यह है कि आज केवल सत्ता को चलाने वाली पार्टी का ही बोलबाला दिख रहा है। विपक्ष को इतना दबा दिया गया है कि वह किसी भी नीति पर सवाल खड़ा नहीं कर पा रहा है। समाज, राजनीति, बुद्धिजीवियों की दुनिया- किसी ओर से भी सरकार से हिसाब नहीं मांगा जा रहा है, बल्कि उलटे भक्ति का माहौल देखा जा रहा है, जो देश के लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। सवाल है कि क्या संविधान में लिखे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं रह गया है? भारत को धीरे-धीरे चीन के रास्ते पर नहीं बढ़ना चाहिए, जहां अभिव्यक्ति पर अनेक तरह की सीमाएं लगाई गई हैं। अगर ऐसा हुआ तो हम भी तानाशाही व्यवस्था की चपेट में आ सकते हैं, जहां बोलने को स्वतंत्रता नहीं मिलेगी।

फिलहाल हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं। हम अपना नेता खुद चुनते हैं। महलों की औलादें हमारी तकदीर नहीं लिखतीं। हम बोल सकते हैं। हमारे हाथ नारों के साथ लहरा सकते हैं। हमारा दिल बेखौफ होकर धड़क सकता है। हमारे होंठ हिल सकते हैं। हमारा सिर ‘इनकार’ में भी हिल सकता है। हम सरकार की बुराइयां दिखा सकते हैं। हम सरकार बना और गिरा सकतें हैं। देश यहां के लोगों से चलता है और यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन यह सरकार अपनी मर्जी से सरकारी संस्थाओं को निजी क्षेत्र में धकेल रही है, जनता के पैसों को अरबपतियों में बांट रही हैं। क्या इसका हिसाब लेने वाला कोई नहीं है? लोकतांत्रिक देश में होने के नाते इन सवालों का जवाब पूरा देश जानना चाहता है।

’आयुष द्विवेदी, हंसराज कॉलेज, दिल्ली विवि

दुख की आग

दिल्ली के अनाज मंडी अग्निकांड के बाद एक खौफनाक मंजर है, जहां कुछ सिसकियों को छोड़ कर सब कुछ खामोश है। व्यवस्था के दरकने का इससे तकलीफदेह नमूना नहीं हो सकता। चार मंजिला मकान के अंदर बगैर सुरक्षा इंतजामों के खामोशी से मशीनें धड़धड़ाती रहीं और किसी को कानो-कान खबर नहीं हुई। मौत की फैक्ट्रियां एक दिन में नहीं बनतीं। लेकिन वही मौत जिंदगी को जरा भी मोहलत नहीं देती। बुरा हो उस सियासत का, जो जली लाशों पर हाथ सेंकने से बाज नहीं आती।

हादसे में मारे गए मजदूरों के परिजनों का दर्द बयान करने को शायद शब्द न मिले। जबकि अग्निशमन के अधिकारी राजेश शुक्ला को कई जानें नहीं बचा पाने का गम खाए जा रहा है। बेशक उनकी बहादुरी और दिलेरी की चर्चा हो, मगर ग्यारह लोगों को बचा लेने की खुशी उनके चेहरे से गायब है। मर्माहत परिजनों के गम के आगे हर खुशी कुर्बान है।

’एमके मिश्रा, रातू

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 चौपाल: मजदूरों की जान
2 चौपाल: रोजगार की फिक्र
3 चौपाल: जोखिम में जननी
ये पढ़ा क्या?
X