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चौपाल: कब तक प्याज व यथार्थ और पर्दा

कई जगहों पर प्याज की माला पहन कर प्रदर्शन किया जा रहे हैं तो कहीं प्याज को भगवान मान कर उनकी पूजा की जा रही है।

Author Published on: December 14, 2019 3:19 AM
सन 2018 के बजट के समय प्रधानमंत्री ने प्राथमिकता जताई थी कि प्याज, टमाटर और आलू के दाम स्थिर रहना चाहिए।

राजधानी दिल्ली के खुदरा बाजार में प्याज सौ से एक सौ चालीस रुपए किलो बिक रहा है। वहीं मदुरई में तो यह एक सौ अस्सी रुपए बिका। इसका कोई तो गंभीर कारण होगा। भारत में चाहे आप शाकाहारी खाना देख लें या मांसाहारी, दोनों में प्याज का खूब इस्तेमाल होता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रति एक हजार व्यक्ति पर नौ सौ आठ लोग प्याज खाते हैं। ऐसे में जब भी प्याज महंगा होता है तो यह सुर्खियों में आ जाता है। बारिश के अलावा कम बुआई खराब फसल और कम उत्पादन और जमाखोरी भी प्याज को महंगा करने के अन्य बुनियादी कारण हैं। सन 2018 के बजट के समय प्रधानमंत्री ने प्राथमिकता जताई थी कि प्याज, टमाटर और आलू के दाम स्थिर रहना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। प्याज के थोक व्यापारियों के मुताबिक कई जमाखोर प्याज सस्ता होने के बावजूद उसे महंगे दामों पर बेच रहे हैं और प्रशासन की ओर से जमाखोरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

हालत यह है कि अब प्याज के इतना महंगा होने पर विरोध प्रदर्शन हो रहा है। कई जगहों पर प्याज की माला पहन कर प्रदर्शन किया जा रहे हैं तो कहीं प्याज को भगवान मान कर उनकी पूजा की जा रही है। सड़कों पर ही नहीं, बल्कि संसद के भीतर भी हंगामा मचा हुआ है। पिछले दिनों कांग्रेस सांसदों ने सरकार की तीखी आलोचना की। संसद के भीतर वह क्षण वाकई हास्यास्पद था जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि वह ऐसे परिवार से आती हैं, जहां प्याज और लहसुन का मतलब ही नहीं है। फिलहाल प्याज के भाव में नरमी के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं।कीमतों में दिनोंदिन इजाफा ही देखने को मिल रहा है।

महाराष्ट्र के सोलापुर बाजार में प्याज की कीमत दो सौ रुपए प्रतिकिलो के पार निकल गई है। इसकी वजह प्याज की कम उपलब्धता है। व्यापारियों का यह तक कहना है कि इस महीने के अंत तक प्याज की कीमतें ऊंची बने रहने के आसार हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि हम महंगे दामों पर आयात के लिए मजबूर हुए हैं। ध्यान रहे कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के मोदी सरकार के वायदे और लक्ष्य में बागवानी फसलों की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका है। बेशक बजट में कई योजनाओं की घोषणा की गई थी, लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग है। हमें यह भी भूलना नहीं चाहिए कि प्याज की कीमतों ने कई सरकारी दावे ध्वस्त कर डाले हैं। लिहाजा यह सवाल स्वाभाविक है कि इस बार प्याज के आंसू किसे रोने पड़ेंगे।

’अमन सिंह, बरेली, उत्तर प्रदेश

यथार्थ और पर्दा

फिल्में चाहे धार्मिक, राजनीतिक या ऐतिहासिक हों, सभी में थोड़ा मसाला और हास्य भरा जाता है, ताकि दर्शक ऊबे नहीं। इधर इतिहास से जुड़ी फिल्मों को लेकर हमारा देश काफी संवेदनशील हो गया है। एक हजार साल पहले क्या हुआ था, उसे लेकर हम आज मरने-मारने को तैयार रहते हैं। 2008 में ‘जोधा अकबर’ से लेकर पिछले साल ‘पद्मावत’ को लेकर काफी हल्लागुल्ला हुआ। अब आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘पानीपत’ को लेकर राजस्थान से लेकर अफगानिस्तान तक विरोध किया जा रहा है। सभी अपने जाति और धर्म से जुड़े किरदारों को गलत ढंग से पेश करने का आरोप लगा रहे हैं। सिनेमा को मनोरंजक बनाने के लिए यथार्थ में थोड़ा-बहुत फेरबदल करने की छूट फिल्मकारों को मिल सकती है। लेकिन कई दफा ऐसे विरोध के कारण फ्लॉप होने वाली फिल्म भी हिट हो जाती है। फिल्मकारों को काम करने के लिए स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। लेकिन अगर इतिहास के मामले में ज्यादा तोड़-मरोड़ की जाएगी तो कुछ सवाल उठ सकते हैं।

’जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर

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