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चौपाल: हांगकांग और लोकतंत्र

हांगकांग वासियों के लिए रोशनी की एक ही किरण दिखाई देती है। वे सब मिल कर दुआ करें कि 2047 के पहले साम्यवाद खत्म हो जाए और लोकतंत्र स्थापित हो जाए।

Author Updated: September 9, 2019 6:03 AM
हांगकांग में प्रदर्शन फोटो सोर्स: (AP Photo/Vincent Yu, File)

हांगकांग की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) केरी लेम की मुश्किलें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। अब तो विवादास्पद प्रत्यर्पण कानून वापस भी ले लिया गया है। फिर भी प्रदर्शनकारी मैदान छोड़ने को तैयार नहीं हैं। अब शायद चीन से ये मांग की जाएगी कि 2047 ही नहीं, बल्कि हमेशा के लिए हांगकांग में ‘एक देश दो नीति’ लागू रहे। ऐसा कभी नहीं होने वाला है। 2047 तक के लिए ही समझौता हुआ है। हांगकांग वासियों को चीनी तानाशाही के तले आना ही पड़ेगा। हांगकांग वासियों के लिए रोशनी की एक ही किरण दिखाई देती है। वे सब मिल कर दुआ करें कि 2047 के पहले साम्यवाद खत्म हो जाए और लोकतंत्र स्थापित हो जाए।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी (जमशेदपुर)

शिक्षा और खुशहाली
हाल में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश में जीडीपी में सुधार की बात को कही ही, साथ ही उन्होंने खुशहाली पर भी जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि देश के उत्थान के लिए बेहतर शिक्षा और शिक्षक भी जरूरी हैं। दरअसल, विदेशों में सरकारों जनता की खुशी को खासतौर से ध्यान में रख कर काम करती हैं। हालांकि हमारे यहां भी शिक्षा पर कागजी घोड़े बहुत दौड़ते हैं किंतु आज भी धरातल पर हमारी शिक्षा पद्वति को बेहतर आयाम नहीं मिला है। इसमें सबसे पीछे सरकारी स्कूल हैं जहां शिक्षा तो सस्ती है लेकिन बिना गुणवत्ता वाली। दूसरी ओर गैर-सरकारी शिक्षा का स्तर अगर थोड़ा बहुत बेहतर जरूर है लेकिन वह महंगी है, इसलिए आमजन की पहुंच से बाहर है। सरकारी स्कूलों में दो तरह के बोझ हैं। पहला शिक्षकों पर शिक्षा के अलावा अन्य सरकारी कार्यों का बोझ और बच्चों पर बस्ते का बोझ। अगर ये दोनों काम हो जाएं तो जरूर सरकारी स्कूल के बच्चे बेहतर शिक्षा पा सकते हैं। लोगों की खुशहाली बढ़ाने के लिए यह कारगर उपाय साबित हो सकता है।
’शकुंतला महेश नेनावा, इंदौर

नशे का नासूर
देश के कुछ राज्यों में नशा नासूर बना हुआ है। इससे हमारी युवा पीढ़ी को हर तरह से कमजोर होती जा रही है। नशे ने न जाने अब तक कितनी ही जवानियां निगल लीं और कितने परिवार बर्बाद कर दिए। अगर नशे के धंधे पर अभी भी नकेल नहीं कसी गई और युवा वर्ग को इस नासूर से नहीं बचाया गया तो भविष्य में इसके दुष्परिणाम और भयंकर रूप में सामने आ सकते हैं। सरकार को इस मुद्दे पर चिंंता नहीं, बल्कि चिंंतन करना चाहिए और कठोर कदम उटाने चाहिए। अगर बच्चों को बचपन से ही नशे के दुष्परिणामों के प्रति अवगत करवाया जाए तो जिंदगी के किसी भी मोड़ पर वे नशे के आदी नही होंगे।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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