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चौपाल: घर के दुश्मन

कोई कह रहा है कि हमारी सरकार आई तो हम पत्थरबाजों को छोड़ देंगे। आखिर ये हो क्या रहा है? दरअसल, आज हमारे लिए जन्मजात दुश्मन पाक से तो बाद में पहले घर के दुश्मनों से सतर्क रहना ज्यादा जरूरी हो गया है।

Author March 12, 2019 3:42 AM
विंग कमांडर अभिनंदन (मध्य में)/ जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा में मुठभेड़ (फाइल फोटो)

सीमा पार के दुश्मन तो पहचाने जा सकते हैं और उनसे सतर्क भी रहा जा सकता है लेकिन घर के दुश्मनों से कैसे निपटा जाए, यह एक टेढ़ा प्रश्न है। कोई हमले के सबूत मांग रहा है तो कोई सरकार और सेना पर तोहमत लगा रहा है। कोई कश्मीर में अशांति फैलाने के लिए उपद्रवियों को पनाह दे रहा है तो कोई देश में रह कर पाक की बोली बोल रहा है। कोई कह रहा है कि हमारी सरकार आई तो हम पत्थरबाजों को छोड़ देंगे। आखिर ये हो क्या रहा है? दरअसल, आज हमारे लिए जन्मजात दुश्मन पाक से तो बाद में पहले घर के दुश्मनों से सतर्क रहना ज्यादा जरूरी हो गया है।
’शकुंतला महेश नेनावा, गिरधर नगर, इंदौर

हाशिये पर बुजुर्ग
आज समाज में संयुक्तपरिवारों का लगातार विघटन हो रहा है। इन टूटते परिवारों के कारण वृद्धजनों की मुसीबतें भी बढ़ रही हैं। इससे उम्र के आखिरी पड़ाव पर वे अपमान का दर्द भरा जीवन जीने को अभिशप्त हैं। जिन बच्चों को कलेजे का टुकड़ा मानते हुए माता-पिता विपरीत हालात में भी पाल-पोस कर बड़ा करते हैं, उन्हीं बच्चों के दिलों में अभिभावकों के लिए जगह कम होती जा रही है। नतीजतन, घर के बड़े-बूढ़े हाशिये पर धकेले जा रहे हैं। उनकी समस्या बढ़ने के साथ ही वृद्धाश्रमों की संख्या भी बढ़ रही है। हालत यह है कि बड़ी संख्या में बीमार बुजुर्ग अपना आखिरी समय वृद्धाश्रम में काटने को मजबूर हैं।
पुराने समय में सबसे बुजुर्ग व्यक्ति परिवार का मुखिया माना जाता था। परिवार के सभी सदस्य आपस में अपना सुख-दुख साझा करते थे। अब बुजुर्गों से बातचीत करने के बजाय नई पीढ़ी सोशल मीडिया पर व्यस्त रहने लगी है। हमें बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए, उनके अनुभवों का लाभ लेना चाहिए। बुजुर्गों को सहानुभूतिपूर्वक सहारा दिया जाना बेहद जरूरी है। बच्चे सुनिश्चित करें कि बुजुर्ग माता-पिता की उपेक्षा न हो। वे अपने कार्यों में इतने भी व्यस्त न हों कि बुजुर्गों से दो पल बात करने का भी हमारे पास समय न बचे।
’राजेंद्र कुमार कुमावत, जयपुर

नीयत का सवाल
कहते हैं कि बार-बार बोला गया झूठ भी सच लगने लगता है। खबरों की खिड़कियों पर अफवाहों के कैक्टस उगेंगे तो सवालों के कांटे चुभेंगे ही! बेशक बालाकोट पर जवाबी कार्रवाई में बिखरी लाशें गिनना फौज का काम नहीं है, फिर भी सियासत के आसमान में अफवाहों के परिंदे उड़ेंगे तो लोग पूछेंगे ही। जमीन अपनी हो या पराई, जब से होश संभाला है नदियों में नाव पलटने से आसमानी हादसों तक हलाक हुए लोग हर बार गिने गए हैं। निशाना ठिकानों पर लगे तो सजा कितने दहशतगर्दों को मिली, बताने में हर्ज भी क्या है! बेशक हम चुन-चुन कर दहशतगर्दों को ही मारने गए थे वरना हमारी दुश्मनी र्इंट-पत्थर की दीवारों से तो नहीं थी। सच का सबूत मांगना जमाने का पुराना दस्तूर है। हमारी फौज की बहादुरी के चर्चे जरूर हों मगर राजनीति इस कदर न हो कि नीयत पर सवाल खड़े हो जाएं।
’एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड

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