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चौपाल: बिगड़ती सेहत

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। ज्यादातर सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय है। संक्रामक रोगों से ग्रस्त मरीज भी अस्पताल के बाहर खुले और गंदे में रहने को मजबूर है।

Author August 12, 2019 4:51 AM
सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा परिवार कल्याण पर खर्च होता है।

भारत में स्वास्थ्य पर कुल व्यय अनुमानित जीडीपी का 5.2 फीसद है। जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय पर निवेश केवल 0.9 फीसद है। यह रकम गरीबों और जरूरतमंद लोगों के लिए कहीं से भी पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। जबकि ऐसे जरूरतमंदों की तादाद कुल आबादी की करीब तीन चौथाई है। सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा परिवार कल्याण पर खर्च होता है। भारत की पचहत्तर फीसद आबादी गांवों में रहती है। फिर भी कुल स्वास्थ्य बजट का केवल दस फीसद हिस्सा ही इस क्षेत्र को दिया जाता है।

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। ज्यादातर सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय है। संक्रामक रोगों से ग्रस्त मरीज भी अस्पताल के बाहर खुले और गंदे में रहने को मजबूर है। भारत में स्वास्थ्य पर निजी खर्च अठहत्तर फीसद के लगभग है। इसका अर्थ यह हुआ कि मात्र बाईस फीसद चिकित्सा खर्च ही सरकार के खाता में आता है। हमारे यहां स्वास्थ्य पर लोगों का निजी खर्च भी दुनिया भर में सबसे अधिक है। अगर देश् के हर नागरिक तक स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ पहुंचाना है तो सरकार को यह जिम्मेदारी लेनी होगी और इसके लिए खर्च की व्यवस्था कर-ढांचे से ही करे। राजनीति से ऊपर उठ कर सरकारें अगर चाहे तो आम आदमी की सेहत सुधार सकती है। इसके लिए सिर्फ इच्छाश्क्ति चाहिए।
’अजीत कुमार गौतम, गोरखपुर

साफ है सरकार का रुख
यह सही है जब महाराजा हरी सिंह कश्मीर के शासक थे, तब पाकिस्तानी कबाइलियों ने अचानक हमला करके कश्मीर का कुछ हिस्सा कब्जा कर लिया था। तभी से पाकिस्तान उसे अपना बताता आ रहा है। यह अच्छी बात है कि केंद्र सरकार ने पीओके के संबंध में संसद में अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। पाक अधिकृत कश्मीर न केवल भारत का है बल्कि वहां के लोग गुलाम कश्मीर को भारत में शामिल करने के पक्ष में भी आ रहे हैं। पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लगातार होते रहते हैं। इसकी वजह वहां होने वाला नागरिकों का शोषण और दमन है। गिलगित और बलूचिस्तान पर पाकिस्तान ने 17 मार्च 1947 को सेना के बूते कब्जा कर लिया था। तभी से वहां राजनीति अधिकारों की मांग करने वालों का दमन किया जा रहा है।
’रितेश उपाध्याय, संत कबीर नगर

 

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