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चौपाल: किसानी का संकट

एनएसएसओ के रिपोर्ट के अनुसार 2001 से 2011 के बीच लगभग नब्बे लाख किसानों ने खेती करना छोड़ दिया। यह आंकड़ा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है।

Author Published on: January 16, 2020 3:26 AM
खेतों में किसान, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों मंदी और आसमान छूती महंगाई की समस्या से जूझ रही है। हमें यह देखना होगा कि इस मंदी के बीच में खाद्य पदार्थों की कीमतें क्यों आसमान छू रही हैं? क्या ये अचानक खाद्य पदार्थों की मांग में वृद्धि का संकेत है? निश्चित रूप से नहीं। खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने का प्रमुख कारण आपूर्ति में कमी है, जिसका प्रमुख कारण बाढ़, सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं हैं। इसके साथ ही जो चीज सबसे ज्यादा गौर करने वाली है, वह है किसानों का खेती से मोहभंग होना। एनएसएसओ के रिपोर्ट के अनुसार 2001 से 2011 के बीच लगभग नब्बे लाख किसानों ने खेती करना छोड़ दिया। यह आंकड़ा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। इस बात पर विचार करना अति आवश्यक है कि जब हमारी सरकारें किसानों के लिए तरह-तरह की कल्याण योजनाएं ला रही है, तो फिर उन्हें खेती छोड़ने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ रहा है? इस बात की तहकीकात करना जरूरी है कि किसानों के लिए बनी योजनाएं धरातल पर किस हद तक कामयाब हुई हैं? सरकार को खाद्य पदार्थों की महंगाई से निपटने के लिए दीर्घकालिक और सतत योजनाओं पर काम करना पड़ेगा जैसे -कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के विकास, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के उपाय करने, शीत भंडार गृहों के निर्माण, ताकि कम उपज के समय इसमें रखे गए अनाज काम आ सकें।
’अभिषेक पाल, प्रयागराज

कंपनियों की मनमानी
वर्तमान में देश की दूरसंचार सेवाओं में बड़ी मूल्य वृद्धि ने आम उपभोक्ता में हाहाकार मचा रखा है। दूरसंचार कंपनियों के मनमाने आचरण ने मध्यम वर्ग को दूरसंचार सेवाओं से दूर रहने को मजबूर कर दिया है। सेवाओं की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि ने भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) के अस्तित्व को औचित्यहीन कर दिया है। लाइफ टाइम वैलिडिटी के साथ बेची जाने वाले सिमकार्ड को इनकमिंग के लिए रिचार्ज कराना और कॉल की दरों में भीषण वृद्धि करना, जबरदस्ती आवश्यकता से अधिक प्रतिदिन डाटा देकर पैसे वसूलना, जिसे केवल कॉल की आवश्यकता है उसे भी जबरदस्ती डाटा बेचा जाना.. आदि भांति-भांति की योजनाएं मध्यम वर्ग और गरीबों की जेब पर एक तरह से हमला है। आम उपभोक्ताओं को ट्राई से ही आखिरी उम्मीद बची है, किंतु ट्राई द्वारा भी कंपनियों को मनमानी करने से न रोकना उनमें व्यवस्था के विरुद्ध क्षोभ भर रहा है। आज दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियां उपभोक्ताओं से 4जी का पैसा लेकर 2जी जैसी सेवाएं उपलब्ध करा रही हैं। साथ ही, कंपनियों द्वारा महीने को अट्ठाईस दिन का बना दिया जाना उपभोक्ताओं के साथ बड़ा धोखा है। सरकार द्वारा इन सेवाओं पर अधिकतम टैक्स लिया जा रहा है, जिसका भार भी अंतत: आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ रहा है। समस्या की गंभीरता को देखते हुए सरकार और ट्राई को दूरसंचार कंपनियों के खिलाफ तत्काल कड़े कदम उठाने चाहिए।
’महेंद्र नाथ चौरसिया, सिद्धार्थनगर

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