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चौपाल: ऐसी खेती

एक तरफ देश में किसान के नाम पर वे लोग हैं जो बड़े स्तर पर व्यापारिक लाभ कमाने के लिए खेती करते हैं तो दूसरी ओर छोटे किसान भी हैं जिन्हें खेती से ही खाना, कमाना और परिवार का पेट पालना है।

Author Published on: August 3, 2019 3:06 AM
किसान की प्रतीकात्मक तस्वीर। (Express Photo)

असली भारत गांवों में बसता है और भारत के अन्नदाता किसान भी गांवों में निवास करते हैं। हालांकि जिन्हें देश का अन्नदाता कहा जाता है, उन्हें कभी आराम की जिंदगी नसीब नहीं होती है। आजादी और बंटवारे के बाद देश भुखमरी की मार झेल रहा था। तब कृषि क्षेत्र में हुई हरित क्रांति ने हमें न केवल अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया बल्कि आज भारत विदेशों को भी अनाज का निर्यात करता है। अब हम पेट भरने की जरूरत के इतर स्वास्थ्य संवर्धी क्षेत्रों में देखने को भी तत्पर हुए हैं। हरित क्रांति ने जहां एक तरफ अन्न भंडार भरे हैं वहीं दूसरी तरफ इसके विरुद्ध भविष्य में गंभीर परिणामों की ओर इशारा करती आवाजें भी उठी हैं। रासायनिक खेती और जीएम फसलों के उपयोग से अज्ञात बीमारियां पैदा होने और देशी फसलों के विलुप्त होने की आशंकाएं प्रकट की गई हैं।

विश्व को एक नई जैविक व प्राकृतिक खेती से परिचय कराने वाले सुभाष पालेकर को पदमश्री पुरुस्कार मिल चुका है। लेकिन यहां समस्या दूसरी है क्योंकि किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं, तो अवश्य ही कृषि में घाटा हो रहा है। यह घाटा कभी प्राकृतिक आपदाओं की वजह से तो कभी अनाज की उचित कीमत न मिल पाने के कारण होता है। सुभाष पालेकर की शून्य बजट खेती में लागत शून्य होने की बात कही जा रही है पर उसमें पैदावार भी कम है और लाभ अनुपात भी कम है। एक तरफ देश में किसान के नाम पर वे लोग हैं जो बड़े स्तर पर व्यापारिक लाभ कमाने के लिए खेती करते हैं तो दूसरी ओर छोटे किसान भी हैं जिन्हें खेती से ही खाना, कमाना और परिवार का पेट पालना है। रसायनों से मुक्त फसलों की चिंता अमीरों के विचार-विमर्श आदि का विषय हो सकता है लेकिन किसान का जीवन भर एक ही प्रयास रहता है- परिवार को सुख चैन से बसर करते देखना। लिहाजा, जो सर्वमंगलमय हो खेती का वही तरीका श्रेष्ठ है।
’चंद्रकांत, एएमयू,अलीगढ़

असुरक्षित बेटियां
उन्नाव दुष्कर्म मामले में देखना होगा कि सरकार और कानून दोषियों को सख्त सजा दे पाएंगे या फिर यह मामला भी तब ठंडा पड़ जाएगा जब मीडिया इससे अपना ध्यान हटा लेगा। अक्सर देखा गया है कि जब तक कोई मामला मीडिया में सुर्खियां बना रहता है तब तक सरकारें और कानून के रखवाले इस पर सतर्क रहते हैं, लेकिन जब मीडिया मामले से ध्यान हटा लेता है तब सरकारें और कानून भी कुंभकर्णी नींद सो जाते हैं। उन्नाव कांड में एक राजनीतिक पार्टी के नेता का नाम आने से आमजन के बीच यह गलत संदेश गया कि राजनीति में नैतिकता का पतन हो चुका है और अपराध राजनीति की छत्रछाया में पल रहा है। बेशक यह बहुत शर्मनाक है कि आजाद भारत में बेटियां सुरक्षित नहीं हैं।

बलात्कार की घटना मुल्क के किसी भी कोने में क्यों न हो, वह देश में बेटियों के असुरक्षित होने को उजागर करती है और सरकारों के बेटियों की सुरक्षा के दावों के झूठ की पोल खोलती है। समय-समय पर लड़कियों और मासूम बच्चियों के साथ हैवानों की दरिंदगी की खबरें रूह तक कंपा देती हैं। आखिर ऐसे हैवान फांसी के फंदे तक क्यों नहीं पहुंचते? क्यों सरकारें और कानून इन दरिंंदों को सख्त सजा देने में देरी करते हैं? देश में बच्चियों के साथ बढ़ते अपराध बहुत बड़ी चिंता का विषय हैं। अगर इन पर नकेल कसने के लिए अभी गंभीरता नहीं दिखाई गई या सरकार और समाज ने इस दिशा में मिलजुल कर प्रयास नहीं किए तो आने वाला समय इससे भी विकट हो सकता है।
’राजेश कुमार चौहान, हरगोबिंद नगर, जालंधर

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