ताज़ा खबर
 

चौपाल: स्वास्थ्य की सुध

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना सरकार के लिए चुनौती है, लेकिन एक और चुनौती जो अभी केंद्र सरकार के सामने विशाल आकार लिए खड़ी है वह है देश की चरमरा चुकी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था।

Author Published on: June 20, 2019 1:16 AM
बिहार में चमकी बुखार से कई बच्चों की मौत का सिलसिला जारी है। फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

भारत दावा करता है कि जियोपॉलिटिकल सूची में देश की रैंकिंग बढ़ती जा रही है लेकिन यहां स्वास्थ्य सेवाओं की हालत उसके इस दावे को शक में दायरे में खड़ा करती है। स्वास्थ्य सेवा पर भारत का कम खर्च सालों से जानकारों के लिए चिंता का विषय है। दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत अपने जीडीपी का महज 1.5 फीसद स्वास्थ्य पर खर्च करता है जो दुनिया के सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक है। भारत ने अपने अंतरिम बजट में रक्षा के लिए जीडीपी का 10.6 प्रतिशत खर्च करने की बात कही जो स्वास्थ्य के मुकाबले पांच गुना ज्यादा है। 2017 में केंद्र सरकार ने वादा किया था कि 2025 तक देश के कुल जीडीपी का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च किया जाएगा। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना सरकार के लिए चुनौती है, लेकिन एक और चुनौती जो अभी केंद्र सरकार के सामने विशाल आकार लिए खड़ी है वह है देश की चरमरा चुकी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था।
’शिवानी पटेल, कानपुर

शपथ और विपथ
हमारे सेक्यूलर देश की संसद का सत्र चल रहा है। वहां नवनिर्वाचित सांसदों का शपथ ग्रहण समारोह जारी है। अल्पसंख्यक समुदाय से बावस्ता एक निर्वाचित सदस्य असदुद्दीन ओवैसी शपथ लेने के लिए उठते हंै और तभी उनके सम्मान में माननीयों द्वारा सदन में ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे बुलंद होते हैं। जवाब में वे उत्तेजित और हताश सांसद भी शपथ के अंत में ‘जय भीम, अल्लाह हू अकबर और जय हिंद’ बोल कर बैठ जाते हैं। अखबार वाले चुप हैं, मीडिया चुप है। अब जब जानकारी के रास्ते चुप हैं, तो जाहिर है कि जनता भी चुप है।
लेकिन हमारा ध्यान बार-बार माननीयों द्वारा ली गई शपथ के इन शब्दों पर जाकर रुक जाता है कि ‘मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा’। एक समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य की वकालत करने वाले संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा की कसम का सदन के भीतर ही ऐसा तात्कालिक निर्वाह अभूतपूर्व है! भूतपूर्व होने की बारी तो शायद संविधान और उसकी रूह की है। अचरज वाली बात नहीं है। आखिरकार यही तो चाहते हैं ‘हम भारत के लोग!’
’राहुल मिश्र, विकास कॉलोनी, चिरगांव, झांसी

नल से जल
नीति आयोग यह कहते हुए देशवासियों को सचेत कर रहा है कि 2020 तक 21 नगरों का भूजल खत्म हो जाएगा और 2030 तक देश की 40 फीसद आबादी की प्यास बुझाना भी मुश्किल हो जाएगा। इस डरावनी भविष्यवाणी के बाद केंद्र सरकार ‘नल से जल’ योजना की शुरुआत करने की बात कर रही है। 2024 तक सभी घरों में पाइप लाइन के जरिए जल देने का वादा किया जा रहा है। कैसे होगा, इसकी रूपरेखा नहीं बताई जा रहा है। नदियों के पाट सिकुड़ रहे हैं। भूजल चट होता जा रहा है। अभी केवल अठारह फीसद घरों तक नल से जल जाता है। शेष बयासी फीसद के लिए काम करना है। वैसे कुछ भी असंभव नहीं है। जल प्रबंधन को सरकार और जनता अगर अपना प्रथम कर्तव्य मान ले तो इस कार्य को भी किया जा सकता है। लेकिन बरसात का जल हर कीमत पर बर्बाद हो जाने से रोकना पड़ेगा।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

 

Next Stories
1 चौपाल: नौकरशाही की सफाई
2 चौपाल: मौद्रिक कवायद
3 चौपाल: वायरस का कहर
ये पढ़ा क्या?
X