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चौपाल: गांधी का रास्ता

गांधीजी के कई बयान हैं जिन्हें टिकाऊ विकास के लिए उनके विश्वव्यापी दृष्टिकोण के रूप में उद्धृत किया जा सकता है।

गांधीजी की आत्मा गांवों में निवास करती थी। उनका मानना था कि किसी देश को जानने के लिए उस देश की राजधानी में नहीं बल्कि उस देश के गांव में जाना चाहिए।

आधुनिक भारतीय चिंतन प्रवाह में गांधी के विचार सार्वकालिक हैं। जैसे-जैसे दुनिया बदल रही है, महात्मा गांधी उतने ही ज्यादा प्रासंगिक होते जा रहे हैं। वे दो अक्तूबर के अलावा भी पूरे विश्व में याद किए जाते हैं। यही प्रमाण है कि वे विश्व विभूति हैं। महात्मा गांधी कभी अमेरिका नहीं गए लेकिन आज पूरे विश्व में भारत के बाद अमेरिका में ही उनकी सबसे अधिक प्रतिमाएं लगाई गई हैं। वे अहिंसा और सत्याग्रह के अग्रदूत थे। अंग्रेजी राज को घुटने टिकाने वाले उनके इस मंत्र का जन्म दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। सत्याग्रह से लेकर सामूहिक रिहाइश, अपना काम खुद करने की सलाह और पर्यावरण संबंधी कदम (जैसे मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल और जल संरक्षण) जैसे विचार फीनिक्स सेटलमेंट के गांधी आश्रम में जन्मे और पनपे।

गांधी को समझना आसान नहीं, विशेषत: अगर बात उनके अर्थशास्त्र की हो तो। इसका मुख्य कारण यह है कि गांधी विश्व की नैतिक समझ के कारण अपने निष्कर्षों तक पहुंचे, न कि विकास, निवेश, मांग या पूर्ति की समझ के कारण। यही वजह है कि उनके अर्थशास्त्र के विचारों को वामपंथी-दक्षिणपंथी-मध्यमार्गी-कम्युनिस्ट-समाजवादी-पूंजीवादी खांचों में रख पाना संभव नहीं है। वे स्वदेशी, ग्रामीण आत्मनिर्भरता, बड़े उद्योगों के बजाय कुटीर और छोटे उद्योगों और उत्पादन में मशीनों की अपेक्षा श्रम के इस्तेमाल में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि पूंजी निर्जीव है, पर पूंजीवादी सजीव हैं और उन्हें परिवर्तन के लिए तैयार किया जा सकता है।’

गांधीजी के कई बयान हैं जिन्हें टिकाऊ विकास के लिए उनके विश्वव्यापी दृष्टिकोण के रूप में उद्धृत किया जा सकता है। उन्होंने 1931 में लिखा था कि भौतिक सुख और आराम के साधनों के निर्माण और उनकी निरंतर खोज में लगे रहना ही अपने आप में एक बुराई है। शायद यही कारण है कि मार्टिन लूथर किंग, दलाई लामा, नेल्सन मंडेला, आग सान सू ची और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा तक बापू से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। गांधीजी की आत्मा गांवों में निवास करती थी। उनका मानना था कि किसी देश को जानने के लिए उस देश की राजधानी में नहीं बल्कि उस देश के गांव में जाना चाहिए।

दुर्भाग्य है कि गांधी के ही देश में उनके आदर्श विचारों की कद्र नहीं है। आज के दौर में भारत ही नहीं बल्कि विश्व समुदाय को भी समझना होगा कि गांधी के सुझाए रास्ते पर चल कर ही एक समृद्ध, सामर्थ्यवान, समतामूलक और सुसंस्कृत विश्व का निर्माण किया जा सकता है।

’अजय प्रताप तिवारी, गोंडा, उत्तर प्रदेश

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