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चौपाल: बैंकों से धोखाधड़ी

धोखाधड़ी के बारे में प्राप्त जानकारी को लेकर बैंकों द्वारा कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समक्ष आपराधिक शिकायत दर्ज कराना आवश्यक होता है लेकिन कार्रवाई के बारे में किसी तरह की सूचना उपलब्ध नहीं है।

Author June 7, 2019 1:07 AM
भारतीय रिजर्व बैंक। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई की तमाम कोशिशों के बावजूद हमारे देश में बैंकों से धोखाधड़ी पर लगाम नहीं लग पा रही है। आरबीआई ने सूचनाधिकार कानून के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों और चुनिंदा वित्तीय संस्थाओं ने 71542.93 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के 6801 मामलों की सूचना दी है। केंद्रीय बैंक ने बताया कि धोखाधड़ी वाली राशि में 73 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पिछले 11 वित्तीय वर्षों में 2.05 लाख करोड़ रुपए की बैंकिंग धोखाधड़ी के कुल 53334 मामले दर्ज किए गए। तमाम सतर्कता और कड़े बैंकिंग नियम-कानूनों के बावजूद इतने बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के मामले सामने आना समूची बैंकिंग प्रणाली पर सवालिया निशान लगाने के लिए काफी है।

गौरतलब है कि धोखाधड़ी के बारे में प्राप्त जानकारी को लेकर बैंकों द्वारा कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समक्ष आपराधिक शिकायत दर्ज कराना आवश्यक होता है लेकिन कार्रवाई के बारे में किसी तरह की सूचना उपलब्ध नहीं है। बैंक धोखाधड़ी के कई बड़े मामलों में भगोड़े आभूषण कारोबारी नीरव मोदी और शराब कारोबारी विजय माल्या से जुड़े मामले भी शामिल हैं। आरबीआई ने फर्जीवाड़े का विश्लेषण कर सबसे ज्यादा प्रभावित तेरह क्षेत्रों की पहचान की है। सीबीआई ने कई बैंकों के मुख्य महाप्रबंधक, महाप्रबंधक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के खिलाफ फर्जीवाड़े में शामिल होने का मामला दर्ज किया है लेकिन इन मामलों में क्या कार्रवाई हो रही है इस बाबत किसी तरह की सूचना नहीं मिल पाई है। आखिर बैंकों के साथ फर्जीवाड़े में शामिल लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर सख्त कदम कब उठाए जाएंगे?
’अमन सिंह, प्रेमनगर, बरेली, उत्तर प्रदेश

कब्जे का हक!
मुल्क बड़ा हो या छोटा विदेशों की सड़कें जाने हमें क्यों लुभातीं हैं! हमारा देश विकसित राष्ट्र बनने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है मगर क्या हम तरक्की के राजमार्गों के लिए वाकई तैयार हैं? दुनिया के मुकाबले पिछड़ने की वजह हमारी सोच और शिक्षा तो नहीं! जिस मुल्क में आजादी के सत्तर साल बाद भी शौचालय के इस्तेमाल पर ज्ञान की घुट्टी पिलाई जाए, राजमार्गों की कीमत समझने में वर्षों लग जाएं, उसमें ऐसा होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
आज भी कई मुख्य मार्गों पर लोग चौपाल से लेकर खलिहान तक बनाए बैठे हैं। रास्ते किनारे आने वाले गैराज, टायरों में हवा भरने वाली मशीनें, खोमचे-ठेलों ने पैदल-पथ को फर्ज से बेखबर कारोबारी इस्तेमाल में ले रखा है। बाकी कसर छोटी गाड़ियों की जगह-जगह पार्किंग पूरी कर देती है। कब्जों का हक में तब्दील होना सियासत की पहली सीढ़ी बन जाता है। लिहाजा, वक्त रहते सड़कों को सिमटने से न रोका गया तो सुधार की हर कोशिश नाकाम हो जाएगी। देश बदल रहा है तो क्या हम नहीं बदल सकते?
’एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड

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