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चौपाल: खेती की खातिर

गर्मियों में चारे की समस्या भी होती है जिससे उसे अपने बैलों को महंगा चारा खिलाना पड़ता है। बीज कंपनियां अपने बीजों की उत्पादन क्षमता के बड़े-बड़े दावे करती हैं लेकिन अक्सर ये दावे खोखले सिद्ध होते हैं।

Author Published on: June 4, 2019 2:11 AM
आंकड़ों के अनुसार, 2015 में 8007 किसानों और 4595 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की।

मई में किसान और उसका परिवार खेत जोतने से लेकर अन्य कृषिकार्यों में काफी व्यस्त रहता है। खरीफ फसलों के लिए इस महीने में खेत जोतना जरूरी होता है क्योंकि जून के मध्य में मानसून भारत में प्रवेश करता है जिसके बाद वह बुआई में जुट जाता है। खेत जोतने से लेकर बुआई तक किसान और उसके सहायक जम कर पसीना बहाते हैं लेकिन अधिकतर मामलों में किसान को उम्मीद के अनुसार अपने श्रम कीमत नहीं मिलती। इस वजह से वह अपने खेत बेचने या आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2015 में 8007 किसानों और 4595 खेतिहर मजदूरों ने आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या की थी। वहीं 2014 में 5650 किसानों और 6710 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या कर ली थी मगर 2015 के बाद किसान आत्महत्या की रिपोर्ट जारी नहीं की गई। आज भी किसान आत्महत्या देश के लिए गंभीर समस्या है। हमारे देश में जो मध्यम और छोटे किसान हैं उनके पास जरूरी संसाधनों की कमी रहती है। जहां बड़े किसान ट्रैक्टर के जरिए आसानी से अपने विशाल खेत जोत लेते हैं वहीं मध्यम और छोटे किसान बैलों की सहायता से खेत जोतते हैं या फिर ट्रैक्टर किराए पर लेकर खेत जुतवाते हैं जिससे खेत जोतना और भी महंगा हो जाता है।

गर्मियों में चारे की समस्या भी होती है जिससे उसे अपने बैलों को महंगा चारा खिलाना पड़ता है। बीज कंपनियां अपने बीजों की उत्पादन क्षमता के बड़े-बड़े दावे करती हैं लेकिन अक्सर ये दावे खोखले सिद्ध होते हैं। कई मामलों में तो बीज बोने के बाद फसल ही नहीं उगती। मध्यम और छोटे किसानों के पास सिंचाई की व्यवस्था न होने से उन्हें अनिश्चित मानसून पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में खेती उनके लिए एक जुआ बन जाती है जहां वे हजारों रुपए के बीज बोकर मानसून पर निर्भर रहते हैं।

ग्रामीण इलाकों में सत्तर फीसद लोगों की जीविका खेती पर निर्भर है। उनकी आय बढ़ेगी तभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था अच्छी तरह चलेगी। इसके मद्देनजर सरकार को कृषि क्षेत्र के विकास और किसानों की बदहाली दूर करने वाली नीतियां बना कर उन्हें ईमानदारी से लागू करना चाहिए। मध्यम और छोटे किसानों के लिए सिंचाई, खाद, बीज, बीमा, मिट््टी की जांच आदि की सुगम व्यवस्था करनी चाहिए। अक्सर देखा गया है कि कई योजनाएं आज भी किसान तक नहीं पहुंच पातीं या उनका जमीनी क्रियान्वयन देखने को नहीं मिलता। कर्ज माफी केवल जरूरतमंद किसानों के लिए हो और खेती में तकनीकी निवेश को बढ़ावा दिया जाए। जब देश का किसान खुशहाल होगा तभी सही मायने में देश की प्रगति होगी।
’निशांत महेश त्रिपाठी, कोंढाली, नागपुर

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