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चौपाल: किसान का संकट

यह संकट इतना विकराल रूप धारण कर चुका है कि उसमें सुधार के लिए सरकार को तुरंत उपाय सोचने होंगे। नीति आयोग के अनुसार पिछले दो साल में किसानों की आय में वास्तविक बढ़ोतरी लगभग शून्य हुई है।

किसान की प्रतीकात्मक तस्वीर। (Express Photo)

किसान सम्मान निधि योजना के तहत अब सभी किसानों को सालाना छह हजार रुपए मिलेंगे। साथ ही, किसानों के लिए पेंशन योजना का एलान भी किया गया है। लेकिन क्या इससे किसानों की हालत सुधर पाएगी? कृषि संकट का समाधान, किसानों की पैदावार और उनके आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाना सरकार के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। यह संकट इतना विकराल रूप धारण कर चुका है कि उसमें सुधार के लिए सरकार को तुरंत उपाय सोचने होंगे। नीति आयोग के अनुसार पिछले दो साल में किसानों की आय में वास्तविक बढ़ोतरी लगभग शून्य हुई है और उसके पिछले पांच सालों में हर साल आधा प्रतिशत से भी कम बढ़ोतरी हुई। यानी, सात सालों से किसानों की आय में वृद्धि न के बराबर हुई है।

ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कोआॅपरेशन एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2000-2017 के बीच में किसानों को फसलों का समुचित मूल्य नहीं मिलने से पैंतालीस लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। 2016 के आर्थिक सर्वे में किसान परिवार की सत्रह राज्यों में आय बीस हजार रुपए सालाना से कम है, यानी 1700 रुपए मासिक या लगभग पचास रुपए रोजाना। सवाल है कि इस आय में कोई परिवार कैसे पलता होगा? खेती में पैसा नहीं है, उसके मजदूरों के पास काम नहीं है। इसके अलावा, मंडी हो, उत्पादन हो या पीएम फसल योजना में मुआवजा ही लेना हो, किसानों को हर कदम पर दिक्कतें आती हैं। किसानों की ये समस्याएं खत्म हो जाएंगी तो वे काफी हद तक आर्थिक संकट से उबर सकते हैं। कुल मिला कर कृषि में सुधार का रास्ता गांव के रास्ते ही जाएगा।
’संजीव कुमार, सहारनपुर

तीन तलाक और विपक्ष

सरकार ने तीन तलाक की प्रथा खत्म करने के लिए जो पहल की है, वह बहुत ही सोच-समझ कर महिलाओं और बच्चों के हित में उठाया गया कदम है। इसका विरोध करने वालों को सोचना चाहिए कि आखिर क्यों नहीं वे इस दकियानूसी परंपरा को खत्म नहीं करना चाहते? क्यों वे अपने राजनीतिक और स्वयं के स्वार्थ के लिए एक बेहतर पहल का विरोध कर रहे हैं? देखा जाए तो तीन तलाक बहुत-सी सामाजिक बुराइयों को ही दूर करेगा, जिसमें घर की बर्बादी, महिलाओं की परेशानी, बच्चों की तकलीफें और इससे उपजी अन्य अनैतिक बुराइयां खत्म होंगी। मात्र विरोध करना ही नहीं, बल्कि गहरी सोच भी होनी चाहिए विरोध करने वालों की कि हम शासन-प्रशासन में रह कर किस तरह सामाजिक बुराइयों को दूर करने में और लोगों के हित के लिए कितना और क्या कर सकते हैं। तभी हम बेहतर समाज सुधारक बन सकते हैं। विवेकहीन राजनीति करने से न तो खुद, न पार्टी, न ही समाज और देश का भला होने वाला है।
’शकुंतला महेश नेनावा, इंदौर

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