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चौपाल: मुद्दों का अकाल

सबसे बुरी हालत में तो क्षेत्रीय पार्टियां हैं जिनके पास न नीति है ना रणनीति है, न कोई एजेंडा है। सपा के पास कोई मुद्दा नहीं है। बस गठबंधन और बसपा की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। वहीं बसपा के लिए कांग्रेस और भाजपा को हराने के अलावा कुछ बचा ही नहीं।

mayawati and akhilesh
मायावती और अखिलेश यादव (फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस)
जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, विपक्ष के मुद्दे खत्म होते जा रहे हैं। हाल में लंदन में नीरव मोदी की गिरफ्तारी के बाद विपक्ष का सबसे बड़ा मुद्दा भी खत्म हो गया। लोकपाल की नियुक्ति भी हो गई, इसलिए यह मुद्दा भी चला गया। फेसबुक, ट्विटर और वाट्सऐप से लेकर यूट्यूब तक पूरा देश ही अब खुद को चौकीदार कह रहा है। हकीकत तो यह है कि वर्तमान में किसी भी दल के पास कोई ठोस मुद्दा है ही नहीं। सबसे बुरी हालत में तो क्षेत्रीय पार्टियां हैं जिनके पास न नीति है ना रणनीति है, न कोई एजेंडा है। सपा के पास कोई मुद्दा नहीं है। बस गठबंधन और बसपा की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। वहीं बसपा के लिए कांग्रेस और भाजपा को हराने के अलावा कुछ बचा ही नहीं। मतदाताओं को ऐसे नीतिविहीन और अपना फायदा देख कर सिद्धांत बदलने वाले दलों से सतर्क रहना चाहिए। एक बेहतर लोकतंत्र के लिए बढ़िया विपक्ष का भी होना आवश्यक है ताकि सत्ता निरंकुश होने से बचे। समय है विपक्ष को जनता के मन को फिर से टटोलने की और उचित मुद्दे उठाने की।
’देवानंद राय, दिल्ली

ये कैसा प्रचार!
राहुल गांधी ‘चौकीदार चोर है’ कह कर वोट मांग रहे हैं, तो प्रियंका अपनी दादी के नाम पर। इनमें से कोई भी मनमोहन सरकार के दस साल के कामकाज पर या अमेठी-रायबरेली में विकास-कार्य के नाम पर वोट नहीं मांग रहा। इनका नकारात्मक और परिवारवादी प्रचार बताता है कि दोनों के पास रचनात्मक या विकास-संबंधी कुछ भी कहने योग्य नहीं है। प्रियंका गांधी को समझना चाहिए कि जनता काम के बारे में जानना चाहती है। क्या आपने अपनी मां और भाई के लोकसभा क्षेत्र में संपूर्ण विकास हेतु गोद लिए गए गांवों- उड़वा और जगदीशपुर- में कोई काम करके दिखाया, जबकि 2015 में आपने ये जिम्मेदारी खुद स्वीकार की थी।
’आस्था गर्ग, बागपत रोड, मेरठ

पर्यावरण के खातिर
आज हम लगातार प्रकृति का दोहन करते जा रहे हैं। इसके संरक्षण की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। इस तरह भावी पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय लग रहा है। जीव प्रेमी और पर्यावरण संरक्षण हेतु राजस्थान के बिश्नोई संप्रदाय ने पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल कायम की है। यह संप्रदाय सदियों से ही प्रकृति के काफी गहरा करीब रहा है और समय-समय पर प्रकृति प्रेम की परीक्षाएं देता रहा है। यह समाज पेड़ बचाने हेतु अपना सिर कटवाने से भी नहीं कतराता। सन 1730 मे राजस्थान के जोधपुर मे खेजड़ली बचाव हेतु तीन सौ से ज्यादा महिलाओं व पुरुषों ने बलिदान दिया था जो पेड़ बचाव के लिए पूरी दुनिया मे अब तक का सबसे बड़ा बलिदान है। पिछले साल सलमान खान काला हिरण मामले को लेकर यह समाज एक बार फिर दुनिया के सामने आया। यह समाज विलुप्त होने की कगार पर खड़े काले हिरण, मोर, खरगोश जैसे वन्य प्राणियों को शिकारियों से बचाता रहा है। राजस्थान की अर्ध-शुष्क जलवायु व उच्च तापमान वाली पृष्ठभूमि में पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन हेतु सरकार के साथ इस समाज का भी अहम योगदान रहा है। समस्त विश्व को एकजुट होकर पर्यावरण संरक्षण के अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए ताकि भावी पीढ़ियों का भविष्य उज्जवल हो सके।
’श्रीनिवास पंवार बिश्नोई, बीकानेर

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