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चौपाल: नैतिकता का पतन

चुनाव नतीजों के बाद केंद्र में जो भी सरकार आए, उसके लिए शुरुआती सौ दिन कम मुश्किल भरे नहीं होंगे। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने चेतावनी दी है कि इस साल भारत सहित दुनिया के सत्तर फीसद देशों पर मंदी का खतरा मंडरा रहा है।

Author Published on: May 14, 2019 2:46 AM
भारत में बढ़ती जा रही अमीरी और गरीबी की खाई। (प्रतीकात्मक फोटो)

पिछले कुछ वर्षों में देश के कर्णधार नेताओं में अनुशासन की कमी के साथ ही नैतिकता में भी गिरावट तेजी से आई है। जनहित व देशहित में यह जरा भी ठीक नहीं है। किसी की जुबान फिसल कर अपभ्रंश फैला रही है तो किसी पर करोड़ों में टिकट बेचने का आरोप लग रहा है। कोई प्रधानमंत्री की गरिमा से खिलवाड़ कर रहा है तो कोई इतनी निम्नस्तरीय भाषा का उपयोग कर रहा जिसे बयां करना भी शोभा नहीं देता। जनता के मूल मुद्दों को तो इन्होंने हवा में ही उड़ा दिया और व्यक्तिगत छींटाकशी मानो इनका मुख्य मुद्दा हो गया हो। जिनको जुबान पर लगाम नहीं, जिनके आचार विचार ही ठीक नहीं, जिन पर मुकदमे चल रहे हों और जो करोड़ों खर्च करके चुनाव लड़ रहे हों, मतदाता उनसे क्या उम्मीद करेंगे कि उन्हें सही सुशासन मिलेगा!
’महेश नेनावा, इंदौर

मंदी की आहट
चुनाव नतीजों के बाद केंद्र में जो भी सरकार आए, उसके लिए शुरुआती सौ दिन कम मुश्किल भरे नहीं होंगे। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने चेतावनी दी है कि इस साल भारत सहित दुनिया के सत्तर फीसद देशों पर मंदी का खतरा मंडरा रहा है। जाहिर है, आने वाली नई सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती होगी, जिसे वैश्विक मंदी के समानांतर विकास की बहाली करनी होगी। गरीबी दूर करने के लिए जरूरी स्रोतों का इस्तेमाल करना बड़ी चुनौती होगी, ढांचागत क्षेत्र और आवासीय क्षेत्र में विकास जारी रखना होगा, क्योंकि इन दोनों क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होते हैं। स्वरोजगार के लिए नए उद्योगों के अवसर बढ़ाने होंगे, इससे औपचारिक क्षेत्र में रोजगार सृजन होगा। नई सरकार को स्वास्थ्य से संबंधित आयुष्मान भारत योजना जैसी सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रम को आगे बढ़ाना होगा। इसके साथ किसानों की आय और मध्यम वर्ग को करों के बोझ से बचाना होगा। वैसे तो आज भारत विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन देश में गरीबी और धनी व्यक्तियों के बीच फासला तेजी से बढ़ रहा है। देश की अस्सी फीसद पूजी चंद अमीरों के पास है। देश के लिए यही काफी निराशाजनक स्थिति है।
’दुर्गेश शर्मा, गोरखपुर

प्रतिभाओं की बेकद्री
तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित एक मैकेनिकल इंजीनीयर एस कुमारस्वामी ने दस साल की मेहनत के बाद एक ऐसे इंजन का आविष्कार किया है, जो असुत जल (डिस्टिल वाटर) से चल सकेगा। यह अपने में एक अलग तरह का इंजन है, जो पर्यावरण अनुकूल भी है, क्योंकि यह आॅक्सीजन छोड़ता है और फ्यूल यानी र्इंधन के तौर पर हाइड्रोजन का इस्तेमाल करता है। मगर अफसोस कि इस इंजन को भारत के बदले जापान में लांच किया जाएगा। प्रशासनिक उदासीनता की वजह से एस कुमारस्वामी को अपने आविष्कार को जापान में लांच करने को मजबूर होना पड़ा रहा है। कुमारस्वामी ने दावा किया है कि इस इंजन को विकसित करने में उन्हें दस साल लग गए। उ्नका कहना है- ‘मेरा सपना था कि मैं इस इंजन को भारत में श्ुरू करूं, इसलिए मैंने सभी प्रशासनिक दरवाजे खटखटाए, मगर मुझे कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। इसलिए मैंने जापान के सरकार से संपर्क साधा और मुझे वहां यह अवसर मिला।’ इस नौजवान इंजीनियर ने भारत में इस इंजन को लांच करने की कोशिशें कीं, लेकिन लालफीताशाही में उलझी नौकरशाही ने इसे होने नहीं दिया। हमारी प्रतिभाओं की इससे ज्यादा बेकद्री और क्या हो सकती है?
’प्रियंबदा, गोरखपुर

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