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चौपाल: महंगी शिक्षा व कब जागेंगे

शिक्षा सिर्फ आभिजात्य वर्ग के लिए ही होगी तो शायद हम वही मैकाले के शिक्षा संकल्पना के छनन सिद्धांत में वापस लौट जाएंगे।

Author Published on: December 12, 2019 3:25 AM
गांधीजी की शिक्षा संकल्पना की बात करें तो उसमें हमेशा अंत्योदय यानी समाज में अंतिम पायदान पर जीवन यापन करने वाला व्यक्ति तक शिक्षा की पहुंच होनी चाहिए।

अगर हम औपचारिक शिक्षा के इतिहास में जाएं तो सर्वप्रथम चार्टर एक्ट, 1813 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के शिक्षा के लिए एक लाख रुपए का अनुदान देने की घोषणा की। लेकिन इस एक लाख रुपए को किस प्रकार से खर्च करना है, यह विचार करते हुए 1835 में लार्ड मैकाले ने छनन सिद्धांत के तहत शिक्षा देने का सुझाव दिया, जिसमें शिक्षा अभिजात्य लोगों को दिया जाना तय हुआ। फिर बाद में यह फैसला लिया गया कि शिक्षा आम जन तक सीधी पहुंचे, इसलिए 1854 में वुड डिस्पैच आयोग बनाया गया, जिसे शिक्षा के इतिहास में मैग्नाकार्टा कहा जाता है।

भारत की आजादी के बाद बहुत सारे आयोग बने, जिसमें जन शिक्षा को नया रूप देने के साथ ही साथ निजीकरण के दरवाजे को भी खोल दिया गया, जिसमें शिक्षा को बेचा और खरीदा जाने लगा। लेकिन अगर हम गांधीजी की शिक्षा संकल्पना की बात करें तो उसमें हमेशा अंत्योदय यानी समाज में अंतिम पायदान पर जीवन यापन करने वाला व्यक्ति तक शिक्षा की पहुंच होनी चाहिए, जिससे उसका सर्वांगीण विकास हो सके। 1964 में कोठारी आयोग और 1986 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने अपनी संस्तुति में कहा कि शिक्षा का बजट जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का कम से कम छह प्रतिशत करने की सिफारिश की, लेकिन सरकारें कभी भी इसको चार प्रतिशत से आगे खर्च नहीं कर पार्इं।

हमेशा शिक्षा को हाशिये पर रखा गया है। अगर आज के संदर्भ में भी देखा जाए तो नई शिक्षा नीति में समग्र शिक्षा की बात कही गई है, क्योंकि विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को संस्थाओं की फीस के अलावा छात्रावास, मेस की फीस और पठन-पाठन संबंधित खर्चों का निर्वहन करना पड़ता है। इसलिए किसी भी विश्वविद्यालय का फीस वृद्धि न्यायोचित नहीं है। इससे समाज में रहने वाले गरीब लोग शिक्षा से वंचित रह जाएंगे, सामाजिक विविधता भी खत्म हो जाएगी। शिक्षा सिर्फ आभिजात्य वर्ग के लिए ही होगी तो शायद हम वही मैकाले के शिक्षा संकल्पना के छनन सिद्धांत में वापस लौट जाएंगे। इसलिए हमें सभी वर्गों को ध्यान में रखते हुए उचित कदम उठाना चाहिए। हमारा संविधान भी शिक्षा के लिए अवसरों की समानता की बात करता है।

’शैलेश मिश्र, बीएचयू, वाराणसी

कब जागेंगे

संपादकीय ‘लापरवाही की लपटें’ (9 दिसंबर) पढ़ा। दिल्ली में एक चार मंजिला अवैध फैक्ट्री में भीषण आग लगने की दर्दनाक घटना में लगभग तैंतालीस लोगों की मौत और कइयों के झुलसने के समाचार ने हर किसी को दुखी कर दिया है। साथ ही यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि बार-बार इस तरह के हादसों के बाद भी सतर्कता क्यों नहीं बरती जाती! करोलबाग में उपहार सिनेमा और सूरत के एक कोचिंग संस्थान की आग अभी आंखों के सामने है। मुआवजा इस दर्दनाक घटना पर मरहम लगाने का विकल्प नहीं हो सकता, पर लापरवाही पर पर्दा डालने का तरीका जरूर हो सकता है। अब इस हादसे पर प्रशासन डंडा पीटेगा, घटना के बाद सतर्कता बरतने और बचाव की बातें की जाएंगी, लेकिन जैसे ही घटना की तपिश कम होती है, आम लोगों की जिंदगी को फिर उसी मोड़ पर कराहने के लिए छोड़ दिया जाता है। कोई भी कार्रवाई और कितना भी मुआवजा किसी मारे गए व्यक्ति के परिवार को हुई क्षति की भरपाई नहीं कर सकता। हम कब जागेंगे?

’साजिद अली, चंदन नगर, इंदौर

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