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चौपाल: वृद्धि की उम्मीद व बैंकों की भूमिका

भारत की अर्थव्यवस्था आज जिस स्थिति में है उसमें बैंकों की बड़ी भूमिका है।

यह सर्वविदित है कि बैंकिंग व्यवस्था वित्तीय लेन-देन से चलती है और विकास भी इसी से करती है।

रिजर्व बैंक द्वारा पेशेवर आकलनकर्ताओं के बीच कराए गए छमाही सर्वेक्षण में भी जीडीपी वृद्धि दर अनुमान 6.1 पर रहा। 2020-21 के लिए यह सात फीसद तक पहुंचा है। यह केंद्रीय बैंक के स्वयं के अनुमान के मुताबिक है। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने बार-बार कहा है कि जब भी गुंजाइश होगी केंद्रीय बैंक व आयकर परिवर्तन संबंधी चिंताओं को दूर करने और अर्थव्यवस्था को उबारने में मदद करता रहेगा। अगस्त-सितंबर में निवेश और वृद्धि बढ़ाने के सरकार के आय, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति में सुधार, सरकारी बैंकों में पूंजी डालने और सरकारी बैंकों के विलय से जीडीपी वृद्धि दर की रफ्तार बढ़ाई जा सकती है। इसके अलावा कारपोरेट आयकर की दर में कमी, दबाव वाली परिसंपत्तियों के तेजी से समाधान और रेपो दर में कटौती का लाभ नीचे तक पहुंचाने से वृद्धि बढ़ाने में मदद मिलेगी।

’अजीत कुमार गौतम, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

बैंकों की भूमिका

किसी देश के बैंकों पर उसकी अर्थव्यवस्था का दारोमदार होता है। ऐसे में जब बैंकिंग व्यवस्था संकट से गुजरती है या उस पर संदेह गहराता है तो उससे अर्थव्यवस्था भी खासा प्रभावित होती है। भारत की अर्थव्यवस्था आज जिस स्थिति में है उसमें बैंकों की बड़ी भूमिका है। यह सर्वविदित है कि बैंकिंग व्यवस्था वित्तीय लेन-देन से चलती है और विकास भी इसी से करती है। लेकिन तमाम घोटालों के बाद, मसलन- पंजाब नेशनल बैंक, पंजाब महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक (पीएमसी बैंक)- लोग बैंकों पर ज्यादा भरोसा करने को तैयार नहीं हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सिमटने और बदनामियों के बाद ग्राहक वर्ग बैंकों की ओर बढ़ने से पहले एक बार सोच रहा है। ऐसे में जब नगदी बैंकों तक नहीं पहुंचेगी तो यह आने वाले समय में अर्थव्यवस्था के लिए और चुनौती भरा होगा। दूसरी ओर अगर बैंकों के नजरिए से देखें तो गैर निष्पादित संपत्तियां उनके लिए गंभीर समस्या बनी हुई हैं।

सरकार भी इन बैंकों की मदद करने के बजाय खुद इन पर निर्भर है। साथ ही बैंकों पर सरकारी योजनाओं को लेकर चलने का भी बोझ है। रेपो दर में लगातार कटौती रिजर्व बैंक की मजबूरी हो गई है मगर उसका कुछ खास असर नहीं हो रहा। अब इस स्थिति में सरकार को कोई ठोस और दूरदर्शी कदम उठाने होंगे ताकि बैंकों से लेकर ग्राहक तक को बल मिले और अर्थव्यवस्था को गति दी जा सके।
’संजय दूबे, आईआईएमसी, नई दिल्ली

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