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चौपाल: कब तक

आखिर कब तक वे पुरखों के कार्यों को भुनाते रहेंगे? काम तो करना होगा और जन आकांक्षाओं पर खरा भी उतरना ही होगा। यह बात वंशवादी राजनीतिकों को जितनी जल्दी समझ में आ जाए उनके हित में ही अच्छा होगा।

Author Published on: May 9, 2019 1:33 AM
नोएडा स्थित एक मतदान केंद्र के बाहर कतार में खड़े मतदाता छतरी लगाकर खुद को धूप से बचाते हुए।

हमारे देश की जनता को राजनीति में वंशवाद से कोई परहेज नहीं है, अगर ये वंशवादी जनता की आकांक्षाओं पर खरे उतरते हैं तो। अगर वे अपने दादा-नाना या माता-पिता की सियासी पुण्याई को भुनाते रहते हैं और विकास या जन कल्याण के काम नहीं करते हैं तो जनता का उनसे मुंह चुराना लाजिमी है। आखिर कब तक वे पुरखों के कार्यों को भुनाते रहेंगे? काम तो करना होगा और जन आकांक्षाओं पर खरा भी उतरना ही होगा। यह बात वंशवादी राजनीतिकों को जितनी जल्दी समझ में आ जाए उनके हित में ही अच्छा होगा।
’हेमा हरि उपाध्याय, खाचरोद, उज्जैन

गांधी की याद
जगमोहन सिंह राजपूत का लेख ‘व्यक्तित्व परिवर्तन का मार्ग’ (7 मई) बताता है कि कैसे हम गांधी और उनकी विचारधारा को भूलते जा रहे हैं। गांधी सहनशील थे, अहिंसा के पुजारी थे यह सब हमारी पीढ़ी को कौन बताएगा? आखिर कौन बताएगा कि जो अंग्रेज गोलियों से नहीं हारे वे एक दुबले-पतले इंसान के मजबूत इरादों से हार गए। लेखक ने सही कहा कि गांधी के एक आह्वान पर देश रुक जाता था, या चल पड़ता था! आज के नेताओं की रैली में तो उन्हीं के खिलाफ नारे लगते हैं। ऐसा इसलिए कि ये लोग नेता बने नहीं, बनाए गए हैं। टेक्नोलॉजी के बदलते दौर में हम सिर्फ यह जानते हैं कि लड़ाइयां गोला-बारूदों से लड़ी जाती हैं, मगर भूल जाते हैं कि गांधी, लिंकन और मंडेला जैसे लोगों ने अपने मजबूत इरादों से दुनिया की बड़ी कही जाने वाली लड़ाइयों को जीता है। आज के नेताओं को गांधी अप्रासंगिक लगते हैं। हम अहिंसा और सहनशीलता को पीछे छोड़ उग्र कर होते जा रहे हैं और यह भविष्य के लिए खतरनाक है। इसलिए हमें अपने बच्चों को महात्मा गांधी, अब्राहम लिंकन आदि महान लोगों की कहानियां बतानी ही चाहिए।
’संजय दुबे, नई दिल्ली

आत्मनिरीक्षण जरूरी
चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को फिर थप्पड़ मारा गया। यह घटना अत्यंत निंदनीय है लेकिन विचार करने की आवश्यकता है कि बार-बार केजरीवाल पर ही ऐसे हमले क्यों होते रहे हैं! हालांकि हमला करने वाला ‘आप’ का ही सदस्य और प्रशंसक बताया गया, पर वह सेना पर केजरीवाल द्वारा दिए गए बयानों के कारण उनसे खिन्न था। वह केजरीवाल और ‘आप’ नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री के बारे में दिए गए बयानों से भी कथित रूप से नाराज बताया गया। आम आदमी पाटी और इसके सर्वेसर्वा को आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है कि सेना पर संदेह जताने और प्रधानमंत्री पर अनर्गल व बिना सबूत आरोप लगाने से न केवल आम जनता में रोष है बल्कि उनकी ही पार्टी के सदस्यों और समर्थकों में भी असंतोष व्याप्त है।

आरोप तब तो सही हैं जब आपके पास सबूत हों अन्यथा जनता को बेवकूफ नहीं समझना चाहिए। केजरीवाल बिना सबूत आरोप लगाने के लिए वैसे ही बदनाम रहे हैं। याद कीजिए, वे कॉमनवेल्थ खेल घोटालों में शीला दीक्षित के खिलाफ पंद्रह सौ पेज का आरोपपत्र अपनी जेब में पड़ा होने की बात कहते थे, लेकिन जब सत्ता में आए तो याद दिलाने वाले व्यक्ति से ही शीलाजी के विरुद्ध सबूत पेश करने को कहने लगे ताकि उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई कर सकें।
झूठ बोल कर सत्ता हथियाना बार-बार न हो सकेगा। कुछ रचनात्मक और धरातल पर उतरने वाले कार्य कीजिए। हर वक्त मोदी विरोध करते रहने से न केवल मोदी और लोकप्रिय हो जाएंगे बल्कि आपकी प्रचंड बहुमत की सरकार भी धीरे-धीरे अल्पमत में आ जाएगी। अब भी समय है, खांड को पानी बन कर बहने से बचाया जा सकता है।
’सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी, नई दिल्ली

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