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चौपाल: सूखा और संकट

विडंबना तो यह है कि पानी के कारण पलायन की यह तस्वीर उस क्षेत्र की है जहां तालाबों की एक पुरानी परंपरा रही है। क्षेत्र की तीन चौथाई आबादी के जीविकोपार्जन का जरिया खेती-किसानी है।

Author Published on: June 3, 2019 1:41 AM
क्षेत्र की तीन चौथाई आबादी के जीविकोपार्जन का जरिया खेती-किसानी है। (Reuters)

बुंदेलखंड का टीकमगढ़ इलाका सदी का सबसे भयानक सूखा झेल रहा है। गांव के गांव खाली हैं। करीब पचास फीसद आबादी यहां से पलायन कर चुकी है। हालांकि यहां जल संकट दशकों से रहा है और बरसात दगा देती रही है। लेकिन पानी की कमी के कारण इतने बड़े पैमाने पर पलायन की शुरुआत दो-तीन दशक पहले से ही हुई। जिले के सौ से अधिक गांवों में तो एक भी आदमी नहीं बचा है। गांव के गांव वीरान पड़े हैं। निर्बल बूढ़े मवेशी अपने हाल पर छोड़ दिए गए हैं। विडंबना तो यह है कि पानी के कारण पलायन की यह तस्वीर उस क्षेत्र की है जहां तालाबों की एक पुरानी परंपरा रही है। क्षेत्र की तीन चौथाई आबादी के जीविकोपार्जन का जरिया खेती-किसानी है। लेकिन अब अधिकतर खेत सूखे पड़े हैं। इतने तालाब होने के बावजूद यहां जल संकट रहता है। जब कहीं से पानी की मांग होती है तो सरकार वहां जमीन खोद कर ट्यूबवेल लगाती है। जबकि इस क्षेत्र में भूगर्भ उत्खनन को सही नहीं माना जाता। यह वह इलाका है जहां अट्ठारह हजार करोड़ की लागत से केन बेतवा नदी को जोड़ कर सूखा दूर करने का सपना दिखाया जा रहा है। जबकि टीकमगढ़ जिले में जामनी नदी को तालाबों से जोड़ कर सैकड़ों एकड़ की सिंचाई का प्रयोग सफल रहा है। वह भी बगैर किसी विस्थापन व पर्यावरणीय संकट के। नदी जोड़ने के कुल बजट का एक फीसद खर्च करके यहां के हर खेत को पानी व हर कंठ को जल का सपना सहजता से साकार हो सकता है, वह भी छह महीने से कम समय में।
’अजीत कुमार गौतम, गोरखपुर

भ्रष्ट आयोग और भविष्य

आज प्रयागराज के हजारों छात्र अपने सपनों के खातिर सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं। चंद पैसों की लालच में न जाने कितनी रातों की मेहनत और न जाने कितनी आंखों के सपने बिक रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले एक दशक से एक भी परीक्षा का आयोजन नियत समय पर और बिना दाग लगे नहीं हुआ है। अगर सिर्फ इस सरकार की बात करें तो अब तक तीन बार शिक्षकों की भर्ती का विज्ञापन निकाला गया, लेकिन तीनों ही भर्तियां दागदार रही हैं। इनमे सिर्फ 2016 वाली शिक्षक भर्ती ही पूरी हो पाई। उसमें भी कॉपी बदलने और नंबरों के हेरफेर की धांधली हुई। 2016 की एलटी ग्रेड शिक्षक की भर्ती आयोग के भ्रष्ट रूप का सबसे बड़ा उदाहरण बन कर सामने आई, जिसमें छात्रों की मेहनत और सपनों को दस और पच्चीस लाख में बेच दिया गया। प्रांतीय लोक सेवा आयोग की सबसे बड़ी परीक्षा की मुख्य परीक्षा का प्रश्नपत्र आयोग के सचिव और परीक्षा नियंत्रक के सहयोग से प्रश्नपत्र छापने वाले प्रिटिंग प्रेस के मालिक द्वारा पच्चीस लाख में बेच दिया जाता है। ऐसे में अन्य छोटी भर्तियां जो पहले पूरी चुकी उनको कैसे मान लिया जाए कि उनमें पूरी ईमानदारी बरती गई है। कहने को तो सीबीआइ जांच पिछले तीन साल से चल रही है, लेकिन छात्रों का भविष्य तो चौपट होता जा रहा है, जिसकी कोई सुध नहीं ले रहा।
’शिवम चतुर्वेदी, प्रयागराज

जल नहीं तो कल नहीं
आज दुनिया जल संकट का सामना कर रही है। पिछले साल केरल बाढ़ की भयानक आपदा झेल चुका है, लेकिन आज पानी की एक-एक बूंद के लिए वह तरस रहा है। बुंदेलखंड में तो सैकड़ों गांव वीरान हो गए हैं। देश के लगभग सभी हिस्सों में बड़े जल संचयन स्थलों में पिछले साल की तुलना में बहुत कम पानी रह गया है। जहां पर कुछ लोग पानी की कमी के कारण पलायन करते हैं तो वहीं राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके के लोग कम पानी में भी अपने प्रत्येक कार्य को सुनियोजित तरीके से करते हैं। गुजरात के कुछ जिले जैसे जूनागढ़, अमरेली और राजकोट के सौ गांव ने पानी की आत्मनिर्भरता का गुर खुद ही सीखा। बिछियावाड़ा गांव से डेढ़ लाख लोग व कुछ दिन की मेहनत के साथ बारह बांध बनाए और एक ही बारिश में तीन सौ एकड़ जमीन सींचने के लिए पर्याप्त पानी जुटा लिया। ऐसे हमारे जीवन में कई तरीके हैं जिसे अपनाकर पानी की बचत कर सकते हैं।
’दुर्गेश शर्मा, गोरखपुर

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