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चौपाल: जात न पूछो व ड्रैगन के साथ

साक्षात्कार तक पहुंचना ही अपने आप में यह बताता है कि अमुक प्रतियोगी अन्य लाखों प्रतियोगियों से अलग है, तभी वह अंतिम चरण तक पहुंच पाया है।

Author Published on: October 16, 2019 2:21 AM
आयोगों की भूमिका सवालों के घेरे में होने के बावजूद हमें प्रतियोगिताओं की सफलता को जाति के चश्मे नहीं देखना चाहिए।

पिछले दिनों जैसे ही लोक सेवा आयोग उत्तर प्रदेश द्वारा पीसीएस 2017 का अंतिम परिणाम जारी किया गया, सभी चयनित प्रतियोगियों को बधाई व शुभकामनाएं जाति के चश्मे से देख कर दी जाने लगीं। यह सही है कि लोक सेवा आयोग समेत अन्य आयोगों की भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे हैं, लेकिन जिस तरह से हम अपनी सहूलियत के अनुसार एक खास जाति व समुदाय के चयनित प्रतियोगियों को बधाई देते हैं और अन्य जाति व समुदाय के चयनित प्रतियोगियों की मेधा पर संदेह प्रकट करते हैं, वह कतई सही नहीं है।

यह गौरतलब है कि लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित पीसीएस परीक्षा तीन चरणों से होकर गुजरती है। जो प्रतियोगी महज प्रारंभिक परीक्षा पास कर लेता है, माना जा सकता है कि उसमें कहीं न कहीं मेधा तो छुपी ही होगी। तभी वह अगले चरण तक पहुंच पाता है। इसी के समांतर मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद साक्षात्कार को पार करना एक बेहद चुनौती-पूर्ण कार्य होता है। साक्षात्कार तक पहुंचना ही अपने आप में यह बताता है कि अमुक प्रतियोगी अन्य लाखों प्रतियोगियों से अलग है, तभी वह अंतिम चरण तक पहुंच पाया है।

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर जिस तरीके से किसी जाति विशेष के प्रतियोगियों की सफलता को देख कर उनकी मेधा पर सवाल उठाया गया, उनकी प्रतिभा पर संदेह प्रकट किया गया, उससे एक प्रतियोगी के रूप में मुझे बेहद कष्ट हुआ। हमें कम से कम लोक सेवा आयोग की मर्यादा और गरिमा का खयाल तो रखना ही चाहिए। आयोगों की भूमिका सवालों के घेरे में होने के बावजूद हमें प्रतियोगिताओं की सफलता को जाति के चश्मे नहीं देखना चाहिए। ऐसा करना उन प्रतियोगियों के साथ नाइंसाफी होगा, जिन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर सफलता अर्जित की है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि यह इसी सरकार के समय हो रहा है, पिछली अन्य सरकारों के दौरान भी जब किसी परिणाम की घोषणा हुई होगी, प्रशंसा और निंदा करने वाले लोगों की जमात चयनित और अचयनितों पर टूट पड़ी होगी, जो कि सरासर गलत है। जाति के चश्मे से किसी प्रतियोगी की सफलता या विफलता का निर्धारण करने वाली सोच न तब सही थी और न अब सही है।

’जीतेंद्र प्रताप यादव, खानियापुर, प्रतापगढ़

ड्रैगन के साथ

हाल ही में चीन के राष्ट्रपति की महाबलीपुरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अनौपचारिक बातचीत हुई। जिस गर्मजोशी के साथ हमारे प्रधानमंत्री ने उनकी आवभगत की वह काबिलेतारीफ थी। इस यात्रा का महत्त्व इसलिए भी अधिक हो गया कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए हटाए जाने के बाद दोनों नेता पहली बार मिल रहे थे। इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी शी-जिनपिंग से मिल चुके थे।

चीन को कहीं न कहीं कश्मीर को लेकर हिचक है। वह पाकिस्तान को एक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहा है और बार-बार कश्मीर को लेकर बयानबाजी कर रहा है। पाकिस्तान की हालत अब उसे बिना रस वाले नींबू की तरह लग रही है। इतिहास गवाह है कि चीन ने हमेशा हमें धोखा ही दिया है। पहले भी जब दोनों नेताओं की बात हुई थी तो डोकलाम विवाद पैदा हो गया था।

पिछले साठ साल के घटनाक्रम पर गौर करें तो पता चलता है कि चीन ने हमेशा अपने प्रतीक चिह्न ‘ड्रैगन’ के अनुसार काम किया है। इसलिए ड्रैगन के साथ काम करने में सर्तकता की आवश्यकता है।

’भूपेंद्र सिंह रंगा, पानीपत, हरियाणा

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