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चौपाल: छीजता विश्वास व इंसाफ का दरवाजा

विधि आयोग ने 1987 में कहा था कि दस लाख लोगों पर कम से कम पचास न्यायाधीश होने चाहिए, लेकिन आज भी दस लाख लोगों पर न्यायाधीशों की संख्या पंद्रह से बीस के आसपास है।

Author Published on: December 13, 2019 3:53 AM
आजादी के बाद से ही अदालतों और जजों की संख्या आबादी के बढ़ते अनुपात के मुताबिक कभी भी कदमताल नहीं कर पाई।

नागरिकता संशोधन विधेयक सरकार की मंशा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। जब देश के सामने बहुत से बुनियादी मुद्दे मुंह बाए खड़े हैं, सरकार इतिहास में जाकर तत्कालीन फैसलों को मन-मुताबिक बदलने का गैरजरूरी काम कर रही है। वर्तमान सरकार किसी भी तरह बहुसंख्यकों को अपने से बांधे रखना चाहती है। सरकार का यह प्रयास देश के बहुधर्मी समाज के लिए एक गलत संदेश है। जिस लोकतांत्रिक देश में एक से अधिक समुदाय रह रहे हों, उसे अपने फैसले बहुत सोच-समझ कर लेने चाहिए। ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे दो समुदायों के बीच किसी भी तरह की दूरी या अलग-थलग किए जाने की भावना बढ़े।

एक छोटी-सी भूल समाज को अविश्वास के घेरे में ले लेती है। इस तरह का अविश्वास बहुत खतरनाक होता है, जिसकी एक झलक विभाजन के समय देश देख चुका है। उस समय भी एक दो गलत फैसलों ने पूरे देश का मंजर बदल के रख दिया था। सरकार को अगर नागरिकता विषयक कोई संशोधन करना था तो उसके मानक सभी समुदायों के लिए बराबरी के होने चाहिए थे। धार्मिक आधार पर इस तरह का तानाशाही फैसला देश के सामाजिक ढांचे को बेतरह प्रभावित करेगा, जो उचित नहीं। सरकार को अपने कथन ‘सबका साथ, सबका विकास’ को ध्यान में रखना चाहिए। इस फैसले पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर सर्वोच्च न्यायालय को इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए। विडंबना यह है कि इन मुद्दों की परतें लोगों को समझ में आ सके, यह भी स्थिति नहीं बनने दी जा रही है। आक्रामक प्रचार-तंत्र के जरिए भाजपा ने लोगों के बीच में जिस तरह की धारणा बना दी है, वह आने वाले समय में देश के साथ-साथ देश में बौद्धिक कसौटी का भी संकट बनेगा।

’घनश्याम यादव, अलवर, राजस्थान

इंसाफ का दरवाजा

अदालतों में मुकदमे की संख्या में बढ़ोतरी अब भयावह रूप लेती जा रही है और यह स्थिति विभिन्न विसंगतियों को जन्म दे रही है। राष्ट्रीय अदालत प्रबंधन की रिपोर्ट के मुताबिक बीते तीन दशकों में मुकदमों की संख्या दोगुनी रफ्तार से बढ़ी है। अगर यही स्थिति बनी रही तो अगले तीस वर्षों में देश के विभिन्न अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या करीब पंद्रह करोड़ तक पहुंच जाएगी। आजादी के बाद से ही अदालतों और जजों की संख्या आबादी के बढ़ते अनुपात के मुताबिक कभी भी कदमताल नहीं कर पाई। इस वजह से न्याय के नैसर्गिक सिद्धांत के मुताबिक न्यायपालिका में भी मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन कायम नहीं हो सका। विधि आयोग ने 1987 में कहा था कि दस लाख लोगों पर कम से कम पचास न्यायाधीश होने चाहिए, लेकिन आज भी दस लाख लोगों पर न्यायाधीशों की संख्या पंद्रह से बीस के आसपास है।

कहते हैं कि दुश्मनों को भी अस्पताल और कचहरी का मुंह न देखना पड़े। यह इसलिए कहा जाता है कि दोनों जगहें आदमी को तबाह कर देती हैं और जीतने वाला भी इतने विलंब से न्याय पाता है कि वह अन्याय के बराबर ही होता है। छोटे-छोटे जमीन के टुकड़े को लेकर पचास-पचास साल मुकदमे चलते हैं। फौजदारी के मामले तो और भी संगीन स्थिति हैं। अपराध से ज्यादा सजा लोग फैसला आने के पहले ही काट लेते हैं। यह सब केवल इसलिए होता है कि मुकदमों की सुनवाई और फैसले की गति बहुत धीमी है। तमाम विसंगतियों के बाद भी न्यायालयी प्रक्रिया के प्रति आम लोगों का विश्वास कुछ इस वजह से भी है कि आम लोगों में विश्वासबहाली के लिए जो काम कार्यपालिका को करना चाहिए था, वह न्यायालय को करना पड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में नेताओं की मनमानेपन और अपराधियों से उनकी सांठगांठ पर चुनाव आयोग और न्यायालय ने मिल कर लगाम कसने की जो कोशिश की है, उससे भी आम लोगों का उस पर भरोसा बढ़ा है। अब वक्त आ गया है कि न्याय के लिए न्याय व्यवस्था में ठोस सुधार किया जाए।

’अनु मिश्रा, बिठुना, सिवान

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