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चौपाल: आपदा और चुनौती, मौसम की मार व कब्जे की जमीन

इतनी अधिक बारिश कि बिहार और उत्तर प्रदेश में तो सवा सौ से ज्यादा लोग मारे गए।

पिछले तकरीबन एक दशक से लग रहा है कि भारत में मौसम चक्र बदल रहा है।

पटना में भारी बारिश के चलते उपमुख्यमंत्री के घर में पानी घुस जाने पर उनके परिवार को बचाव दल ने निकाला। खास लोगों का यह हाल रहा तो आमजन का क्या हाल होता है यह पीड़ा जनसेवकों को दिल की गहराइयों से महसूस करनी होगी। बिहार सरकार सुशासन का दावा करती है, लेकिन भारी बारिश ने उसके विकास, निर्माण, सुव्यवस्थित नियोजन व सुशासन की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं। आम जनता कितनी परेशानी में होगी, इसका एहसास हमारे नेताओं को होना चाहिए। इन आपदाओं से दूर भागने की बजाय उन्हें चुनौती मान कर नियोजित विकास पर जोर देना चाहिए। केवल सुशासन का ढोल पीटने से काम नहीं चलता। उसके लिए सुशासन को जमीन पर हकीकत के रूप में उतारना होता है।

’हेमा हरि उपाध्याय अक्षत, खाचरोद, उज्जैन

मौसम की मार

पिछले तकरीबन एक दशक से लग रहा है कि भारत में मौसम चक्र बदल रहा है। मौसम विभाग घोषणा कर देता है कि 20 जून को मानसून केरल पहुंच जाएगा। फिर तारीख को आगे बढ़ाने का सिलसिला शुरू होता है। मतलब, मौसम का सटीक पूर्वानुमान अब नामुमकिन होता जा रहा है। जब बादलों को बरसना चाहिए तो बरसते नहीं और जब नहीं बरसना चाहिए तो बाढ़ आ रही है। इस साल सितंबर में बारिश ने पिछले सौ साल के कीर्तिमान को ध्वस्त कर दिया है। जो प्रदेश सूखाग्रस्त थे जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि, उन्हें पानी-पानी कर दिया। इतनी अधिक बारिश कि बिहार और उत्तर प्रदेश में तो सवा सौ से ज्यादा लोग मारे गए। साफ-सुथरे शहर पुणे का हाल देखकर लगा जैसे वहां भूकंप आया हो।

यह असल में जलवायु परिवर्तन का नतीजा है। हम इंसानों द्वारा प्रकृति के अतिशय दोहन का परिणाम है कि जिन देशों का तापमान कभी शून्य से नीचे हुआ करता था आज वह 40 डिग्री को पार कर रहा है। जहां गर्मी पड़ती थी वहां बर्फबारी हो रही है। आज पूरा विश्व मौसम की मार को झेल रहा है। मगर प्रकृति का अनियंत्रित दोहन रोकने को कोई तैयार नहीं है।

’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

कब्जे की जमीन

कहना शायद गलत न हो कि जमीन हड़पना हमारी फितरत का ही हिस्सा है। अगर खाली पड़ी सरकारी भूमि हो तो पौ-बारह! बंगले भले ही आलीशान हों लेकिन हमारे ‘रैंप’ और ‘गॉर्ड रूम’ सरकारी जमीन पर ही बनेंगे। छोटे घरों के छज्जे, सोकपिट और चहारदीवारी का कुछ हिस्सा सड़कों पर होना भी हमारा हक है। जिम्मेवार महकमा भी अपनी गैरजिम्मेदारी का सबूत देने में पीछे नहीं है। हद तो तब है जब सघन आबादी वाले इलाकों में फुटपाथ का इस्तेमाल धड़ल्ले से पार्किंग के लिए किया जाता है।

पुलिस-प्रशासन की नाक के नीचे दुकानदारों द्वारा किए गए अवैध कब्जों का दायरा फुटपाथ के पार तक हो जाता है। क्यों न ऐसी लापरवाहियों के लिए भी त्वरित दंड का प्रावधान हो? राहगीरों के लिए फुटपाथ एक अहम जरूरत है जहां सरकारों की उदासीनता साफ झलकती है। अनधिकृत कब्जे पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी भी बेअसर है। निश्चित रूप से एक ईमानदार कार्ययोजना बनाने की जरूरत है ताकि राहगीरों को अतिक्रमण मुक्त फुटपाथ पर बेरोक-टोक सुरक्षित चलने का हक मिले।

’एमके मिश्रा, मां आनंदमयीनागर, रातू, रांची

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