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चौपाल: दूरियों के बावजूद व आपदा और सजगता

इस तरह देखें तो पाकिस्तान का शुक्रिया करना बनता है। पाकिस्तान को लेकर भारतीय जनता पार्टी के मिजाज थोड़े अलग हैं।

Author Published on: October 15, 2019 1:47 AM
यह सोच कर थोड़ी तसल्ली होती है, क्योंकि पहले ऐसा नहीं होता था, या कम होता था।

एक बात तो बिल्कुल सच्ची और बड़ी दिलचस्प भी है कि जब पाकिस्तान का विरोध करने की धुकधुकी होने लगती है तो चाहे राजनीति वाले हों या तथाकथित देशभक्त और मीडिया के चैनल, सब में एक-दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ लग जाती है। विपक्ष भी अन्यथा असहमत होने के बावजूद इस प्रसंग में हामी भरने की प्रतिबद्धता दिखाता है। एक सच्चे देशभक्त होने का सबसे बड़ा सबूत और सुकून ही जैसे यह हो चला है कि पाकिस्तान की जम कर धुनाई करो, खिल्ली उड़ाओ और सब तरफ लकीरें खींच कर उसे दुनिया के नक्शे पर ‘अलग-थलग’ करा देने का श्रेय लूटो। विचारों में तालमेल और कहीं हो या न हो, पर इस सियासी खेल में सभी शामिल हो जाते हैं। चलिए, कोई एक बिंदु तो है जहां आकर हमारे प्रमुख राजनीतिक दलों में ‘मिले सुर मेरा-तुम्हारा’ हो जाता है।

यह सोच कर थोड़ी तसल्ली होती है, क्योंकि पहले ऐसा नहीं होता था, या कम होता था। लेकिन अब तो स्थिति यह है कि पाकिस्तान को पड़ोसी की बजाय दुश्मन बताने पर सहमति वाली गर्दन हिलाना बेहतर माना जाता है। इस तरह देखें तो पाकिस्तान का शुक्रिया करना बनता है। पाकिस्तान को लेकर भारतीय जनता पार्टी के मिजाज थोड़े अलग हैं। लोकसभा चुनावों के दौरान भी पार्टी का प्रचार-राग पाकिस्तान ही रहा। बालाकोट, पुलवामा वगैरह इसी राग के वादी-संवादी स्वर थे।

लेकिन यह जरूरी नहीं है कि एक दल या उसके समर्थकों की सोच संपूर्ण देश के मन का वशीकरण कर ले। कश्मीर के संदर्भ अलग हैं। लेकिन बंटवारों के दंश झेलने वाला देश का छोटा-सा सूबा पंजाब, जो इधर ‘चढ़दा पंजाब’ कहाता है, सात दशक बीत चुकने के बाद भी अपनी देह के कटे हिस्से ‘लैंहदा पंजाब’ को भीतर धड़कते हुए पाता है। यह स्थिति दोनों तरफ एक-सी है और ये अहसास हमेशा बने रहेंगे।

महज इसलिए नहीं कि दोनों के पुरखों की राख दूसरी तरफ वाली मिट्टी में समाई हुई है। बल्कि इसलिए ज्यादा कि उनके लिए वह धरती बाबा नानक और अपने सूफियों, पीरों-फकीरों के नाम पर पूजनीय है। दहशतगर्दी की आंधियां सरहद के उस पार से उठें या इस पार से, चुनावी मंचों पर खड़े सियासतदान जंग की धमकियां दें या परमाणुओं की, पंजाब यह सब झेलते हुए भी दूरियां मिट जाने की कल्पना से रोमांचित होता रहा है।

’शोभना विज, पटियाला

आपदा और सजगता

ऐसी कई प्राकृतिक या अप्राकृतिक घटनाएं होती हैं जिसके कई पक्ष होते हैं। पटना में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा को देखें तो यह घटना एक ओर जहां प्रकृति की मार है, वहीं दूसरी ओर व्यवस्था की विफलता। इसीलिए कह सकते हैं कि यह कोई नई आपदा नहीं है कि जिसके प्रति हम जागरूक नहीं रहें और हमारी व्यवस्था अनुकूल न रहे। यह तो आदिकाल से मानव जीवन ही नहीं वरन संपूर्ण जीव जगत के लिए संकट का विषय है।

सर्वविदित है कि विश्व भर में जापान इकलौता देश है जहां भूकम्प जैसी आपदा आम बात है, फिर भी वह एक संपन्न राष्ट्र है। सजगता और विकसित विनिर्माण विधि द्वारा जापान और उसके नागरिकों ने इस चुनौती से लड़ना सीख लिया। हम व्यवस्था और प्रकृति को दोष न देकर यदि आज भी सजग हो जाएं तो बड़ी-से-बड़ी आपदाओं का सामना बिना व्यापक क्षति के कर सकते हैं। हर व्यक्ति जागरूक हो, व्यवस्था सजग हो।

’कर्मवीर साव, श्रीनगर, बेलहर, बांका, बिहार

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