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चौपाल: लोकतंत्र बनाम भरोसा

सवाल है कि सरकार के कर्णधारों से इस देश के आमजन का भरोसा क्यों टूट रहा है! ये इसके लिए खुद जिम्मेदार हैं। पिछले छह सालों से जनता बहुत ध्यान और सूक्ष्मता से यह आकलन कर रही है कि ये कहते कुछ और हैं और इनका एजेंडा कुछ और ही होता है।

दिल्ली पुलिस के जवानों ने जामिया के छात्रों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा। फोटो सोर्स: गजेंद्र यादव इंडियन एक्सप्रेस

‘दमन और रास्ता’ (संपादकीय, 17 दिसंबर) पढ़ा। पिछले दिनों पारित नागरिकता संशोधन कानून के खिल़ाफ देश भर में आंदोलन हो रहे हैं। सरकारी संपत्ति की बर्बादी हो रही है। इसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए, कम है। लेकिन इसी के साथ इस देश में कई और भी अनुत्तरित प्रश्न हैं, जैसे वर्तमान सरकार की कानों पर अहिंसक और शांतिपूर्ण आदोलनों से जूं भी नहीं रेंगती। उदाहरण के लिए पिछले दिनों रेलवे के निजीकरण करने के फैसले के विरोध में रेलवे के लाखों कर्मचारियों और आत्महत्या करते भारत के लाखों किसानों द्वारा अपनी फसलों के उचित मूल्य निर्धारण के लिए बार-बार किए गए शांतिपूर्ण और अहिंसक हड़तालों, प्रदर्शनों और आंदोलनों के बाद भी इस कथित लोकतांत्रिक सरकार के कर्णधारों को कोई फर्क नहीं पड़ा। ज्यादातर टीवी चैनल दिन-रात सत्तारूढ़ पार्टी के किए हर गलत-सही कृत्य का एकतरफा प्रचार करने के सिवा कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों को लेकर किए गए अहिंसक प्रदर्शनों को दिखाना तक भी जरूरी नहीं समझा।

समाचार पत्रों के अनुसार इस लोकतांत्रिक शासन के कर्ताधर्ताओं द्वारा दिल्ली पुलिस के अपने प्यादों के माध्यम से दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया के गेट के सुरक्षा गार्डों को धकियाते हुए, बगैर उसके प्रॉक्टर या कुलपति की इजाजत के विश्वविद्यालय में घुसकर जो तांडव मचाया, उसे देख कर तानाशाही शासन का खौफ उभरता है। खबरों के अनुसार दिल्ली पुलिस ने विश्वविद्यालय परिसर में लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं को शौचालय तक से खींच-खींच कर उन्हें किसी संगीन अपराधी की तरह मारा-पीटा। यही नहीं, वहां के कृत्य को कवरेज करती एक महिला पत्रकार से अमर्यादित और अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया।

सवाल है कि सरकार के कर्णधारों से इस देश के आमजन का भरोसा क्यों टूट रहा है! ये इसके लिए खुद जिम्मेदार हैं। पिछले छह सालों से जनता बहुत ध्यान और सूक्ष्मता से यह आकलन कर रही है कि ये कहते कुछ और हैं और इनका एजेंडा कुछ और ही होता है। इनकी नीयत में खोट है। आखिर दिल्ली पुलिस द्वारा अमार्यादित, हिंसक व्यवहार करने का आदेश किसने दिया? इनकी बातों और इनके कामों में इतना फासला क्यों है? प्रजातंत्र में प्रजा का विश्वास खोना किसी भी शासक के लिए गंभीर संदेश है।
’निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

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