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चौपाल: दिल्ली की हवा, अश्लीलता का प्रसार व पराली से खाद

सेंसर बोर्ड से फिल्मों पर तो नियंत्रण हो जाता है लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए कोई सेंसर या नियम-कानून लागू नहीं होते हैं।

Author Published on: October 18, 2019 2:08 AM
अब ये फिल्में डिजिटल (ऑनलाइन) प्लेटफॉर्म के जरिए ‘वेब सीरीज’ का रूप ले रही हैं।

दिल्ली-एनसीआर में आठ वर्ष बाद लगभग तीन महीने का समय ऐसा रहा जब हवा लगातार सांस लेने लायक बनी रही। मानसून के दौरान भी स्थिति काफी हद तक सही रही। नौ अक्तूबर तक वायु गुणवत्ता सूचकांक 173 यानी मध्यम स्तर तक था पर उसके अगले ही दिन अचानक खराब श्रेणी में पहुच गया। तब से लगातार दिल्ली की हवा में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ती जा रही है। इसके आगे और बढ़ने की आशंका है क्योंकि हरियाणा में पराली जलाई जाने लगी है। मानसून के जाते ही दिल्ली के स्वच्छ हवा चली गई। अब सरकार जनता को विश्वास दिलाने के लिए कागजी कार्रवाई कर रही है। आखिर इस समस्या को गंभीरता से कब लिया जाएगा?

’नीतीश कुमार पाठक, आश्रम, नई दिल्ली

अश्लीलता का प्रसार

समाज के कई पहलुओं को हम फिल्मों के जरिए समझते हैं। अब ये फिल्में डिजिटल (ऑनलाइन) प्लेटफॉर्म के जरिए ‘वेब सीरीज’ का रूप ले रही हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लोगों के घरों में स्मार्टफोन के माध्यम से खासी पैठ बना ली है जिसका लाभ उठाकर लगातार गाली-गलौच, नशा व अश्लील यौन संबंधी सामग्री परोसी जा रही है।

सेंसर बोर्ड से फिल्मों पर तो नियंत्रण हो जाता है लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए कोई सेंसर या नियम-कानून लागू नहीं होते हैं। एक ओर सरकार पॉर्नोग्राफी वेबसाइट बंद करने का प्रयास कर रही है मगर दूसरी तरफ इन प्लेटफार्म के जरिए इसे बढ़ावा मिल रहा है। इसकी लत से युवा अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। हाल ही में बेंगलुरु के एक युवक को अस्पताल में इसलिए भर्ती कराया गया कि उसे ‘नेटफ्लिक्स’ की लत गई थी। ऐसी लत खासकर युवाओं को आकर्षित कर नशा और अश्लील यौन सामग्री देखने पर मजबूर कर रही है।

हाल में ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने जस्टिस फॉर राइट्स फाउंडेशन (एनजीओ) द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी थी पर उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के पीठ ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय और संचार मंत्रालय को नोटिस जारी किया व नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो जैसे ऑनलाइन मीडिया प्रसारण की सामग्री को नियंत्रित करने के लिए दिशा-निर्देश तय करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है।

’प्रमोद पांडेय, दिल्ली

पराली से खाद

विकास अक्सर विनाश के कंधों पर सवार होकर आता है। जब से मजदूरी ज्यादा होने के कारण और मशीनों से कटाई आसानी से हो जाने लगी, तभी से किसानों ने खेतों में पराली जलाना शुरू कर दिया। हाथ से कटाई होती थी तो भूसा बचता था और भूसा इस्तेमाल हो जाता था। अब ऐसा नहीं हो पाता और पराली जलाने से पर्यावरण को कितना ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है इसे लेकर पर्यावरणविदों ने अभी से आगाह करना शुरू कर दिया है। दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हवा जरूरत से ज्यादा जहरीली हो चुकी है।

इसे रोकने की जिम्मेदारी सरकार की है। यदि किसानों को विधिवत जानकारी दी जाए और समझाया जाए कि पराली को ‘बायो कंपोस्ट’ के जरिए खाद बनाकर खेत में ही फिर इस्तेमाल कर लें तो अगली फसल बिना कीटनाशक और बिना खाद के भी बहुत अच्छी हो सकती है। स्थितियां बद से बदतर हों उसके पहले ही इसके लिए सरकार को पहल करनी होगी।
’रमेश माहेश्वरी, सुल्तानपुर

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