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चौपाल: घटता मतदान

असीमित धनराशि, तूफानी और मीडिया की व्यापकता से लैस होने के बावजूद अभी तक 60-65 फीसद का मतदान होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक माना जाना चाहिए।

Author Published on: May 14, 2019 2:39 AM
सौ से ज्यादा कैंडिडेट को एक हजार वोट तक नहीं मिले (एक्सप्रेस फाइल)

छठे चरण की समाप्ति के बाद मतदान प्रतिशत के आंकड़ों से स्पष्ट हो रहा है कि कुछ राज्यों को छोड़ कर देश का औसत मतदाता उदासीन है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1951-52 में जब चुनावी प्रचार तंत्र शैशवावस्था में था तो मतदान करीब इकसठ फीसद हुआ था। लेकिन आज असीमित धनराशि, तूफानी और मीडिया की व्यापकता से लैस होने के बावजूद अभी तक 60-65 फीसद का मतदान होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक माना जाना चाहिए। जब देश की साक्षरता दर 70-75 फीसद है तो फिर मतदान का प्रतिशत इतना कम होना गंभीर बात है। यह लोकतंत्र की विडंबना है कि अभी तक चुनाव आयोग ने मतदान में हो रहे क्षरण को जरा गंभीरता से नहीं लिया है। राजनीतिक दलों द्वारा इतने धुंआधार प्रचार के बाद जब ऐसी विकट स्थिति है तो फिर इस खर्चीले अभियान को बंद कर जनता के समक्ष मीडिया माध्यम से ही प्रचार के विकल्प पर विचार करना हितकारी होगा। चुनाव आयोग को आॅस्ट्रेलिया की मतदान व्यवस्था को लागू करने पर विचार करना चाहिए जहां मतदान अनिवार्य है और जो इसमें भाग नहीं लेते हैं उन्हें बीस डॉलर आर्थिक दंड सरकार को देना पड़ता है।
’अशोक कुमार, पटना

उठता भरोसा
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में छठे चरण में उम्मीद के मुताबिक भी मतदान न होना सत्ताधारियों और राजनेताओं के लिए शर्मनाक और निंदनीय है, क्योंकि इनके झूठे वादों, नारों और जुमलेबाजी से मतदाता उकता चुका है और इसलिए नेताओं पर से भरोसा उठ गया है। छठे चरण में पश्चिम बंगाल को छोड़ कर अन्य किसी भी संसदीय क्षेत्र में लगभग सत्तर प्रतिशत से ज्यादा मतदान नहीं हुआ। दिल्ली में भी लगभग साठ प्रतिशत ही मतदान हुआ। कम मतदान लोकतंत्र, देशहित और जनहित के लिए जरा भी उचित नहीं है। इससे तो देश की राजनीति में और गंदगी बढ़ेगी और सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ने के रास्ते साफ होंगे। अब तो चुनाव आयोग ने ईवीएम में नोटा का बटन भी उपलब्ध करवा दिया है। अगर कोई भी उम्मीदवार उचित नहीं लगता है तो नोटा का बटन दबा कर इसके बारे चुनाव आयोग को अवगत करवाया जा सकता है। देश के बुद्धिजीवियों और अन्य लोगों को चाहिए कि ये सब देश के अशिक्षित, लोकतंत्र के अज्ञानी और लालच में आकर अपने कीमती मत का प्रयोग करने वालों को लोकतंत्र की परिभाषा समझाएं और उन्हें जागरूक करें।
’राजेश कुमार चौहान, जालंधर

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