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चौपाल: संकट और सवाल

सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सन 2024 का चुनाव जितवा पाएंगे। रायबरेली में पराजित और वायनाड में लोकप्रियता से नहीं, गणित से राहुल की जीत अपराजेय कांग्रेसियत तो नहीं है।

Author June 15, 2019 2:10 AM
हरीश रावत और राहुल गांधी फाइल फोटो- फाइनेंशियल एक्सप्रेस

कांग्रेस का संकट, वैयक्तिक नहीं, वैचारिक है। ऐतिहासिक दो महान पराजयों के बावजूद अब भी कांग्रेस की जाजम, वैयक्तिक मनुहार में रत है, जबकि कांग्रेस का वास्तविक संकट वैयक्तिक है ही नहीं। इसीलिए सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सन 2024 का चुनाव जितवा पाएंगे। रायबरेली में पराजित और वायनाड में लोकप्रियता से नहीं, गणित से राहुल की जीत अपराजेय कांग्रेसियत तो नहीं है। सन 1985 के बाद वंशवाद से नियंत्रित कांग्रेस, समाजवाद, राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार उन्मूलन हेतु कितने कदम चली, कांग्रेस का शासन चला, किंतु कांग्रेसियत डूबती रही। मान भी लिया जाए कि राजीव गांधी को बोफर्स मामले में झूठा बदनाम किया गया था, किन्तु उनकी शेष कर्मठता उन्हें चुनाव क्यों नहीं जिता सकी? वीपी सिंह और उनकी विविध रूपधारी समाजवादी मंडलिया मंडल आयोग की सिफारिशों के बावजूद डूब गर्इं। हास्यास्पद है कि आरक्षण के जातीय फार्मूलों से राजनीति करने वाले पूर्व के कांग्रेसहंताओ के बल पर कांग्रेस प्रधानमंत्री का पद चाहती थी। आरक्षण मूलत: वोट बैंक बनाने का सूत्र है, यह मतदाता समझ गया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी रहें या प्रियंका गांधी वाड्रा, अब मतदाता फोटो के नीचे लिखी कर्म कहानी पढ़ कर वोट देता है।
अरविंद पुरोहित, अलकापुरी, रतलाम

जनप्रतिनिधियों का आचरण
निर्वाचित नेताओं को कम से कम यह मालूम होना चाहिए की उनके संसदीय क्षेत्र की समस्याएं क्या हैं, किस समस्या को प्रमुखता से उठाना है, जिस आम आदमी ने संसद तक पहुंचाया है और जो जिम्मेदारी दी है, उसका निर्वहन कैसे करना चाहिए, समस्याओं की प्राथमिकता क्या हो, संबंधित विभाग के अफसर से किस तरह से बात कक समाधान निकाला जाए आदि। लेकिन व्यवहार में ऐसा देखने में आता नहीं है। विभागीय अधिकारियों से जनप्रतिनिधियों और राजनेताओं के उलझने की कई घटनाएं आम बात हैं। अधिकारियों के साथ बैठकों के दौरान अपशब्दों का प्रयोग, धमकियां और मारपीट जैसी घटनाएं बताती हैं कि हमारे जनप्रतिनिधि किस तरह की कार्य-संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। नवनिर्वाचित सांसदों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदाचरण की नसीहत दे चुके हैं। आम चुनाव में भी राजनेताओं ने जिस भाषा का उपयोग किया, उसकी बेशर्मी किसी से छिपी नहीं है। अब जरूरत तो इस बात की है कि केंद्र सरकार जनप्रतिनिधियों के लिए एक अलग आयोग गठित करे जो राजनेताओं के आचरण पर विशेष निगरानी रखे। कौन नेता कहां, कब और क्या बोलते हैं। सदाचार के रास्ते पर चल कर ही राजनीति को साफ-सुथरा बनाया जा सकता है।
’रितेश कुमार उपाध्याय, संत कबीर नगर

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